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Thursday 17th of October 2019
ब्लॉगर मंच

गांधीदर्शन सभी के लिए एक अवलोकन

dharamveer chandel

हम सभी हिन्द के लोगों के लिए यह खुशी का मौका है कि महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मना रहे हैं। हम सभी हिन्द के लोगों के लिए यह खुशी का मौका है कि महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मना रहे हैं। यदि गांधी जिंदा होते तो डेढ़ सौ वर्ष के हो जाते, लेकिन नाथूराम गोड़से की बंदूक से निकली तीन गोलियां ने महामानव को असमय ही मौत की नींद सुला दिया। बापू 125 वर्ष जिंदा रहना चाहते थे, लेकिन उस दौर के माहौल से वे टूट गए थे। गांधी के नश्वर शरीर को तो उन्होंने शांत कर दिया, लेकिन गांधी के विचार आज भी हमारे कानों में गूंज रहे हैं और इतिहास के हर तोड़ पर हम सभी का मार्गदर्शन करते हैं। प्रख्यात वैज्ञानिक आइंसटीन ने कहा था कि ‘आने वाली पीढ़ियां बामुश्किल यह विश्वास करेंगी कि गांधी नाम का हाड़-मांस का व्यक्ति, कभी इस पृथ्वी पर चलता - फिरता भी था। हिन्दुस्तान की तवारीख में दर्ज है कि घुटनों तक आधी धोती पहनने और आधी को शरीर  पर लपटने वाले संत ने, अंग्रेजों के सूर्य को भारत से सदा के लिए अस्त कर लिया था, जिनके लिए कहा जाता था कि अंग्रेजों का सूर्य भारत से कभी भी अस्त नहीं होता है। गांधी एक व्यक्ति का नाम नहीं हैं, बल्कि एक विचार और दर्शन है। गांधी भारतीय राजनीति में धुमकेतु की तरह प्रकट हुए, लोगों ने उन्हें अनेक रूपों में देखा। किसी को गांधी में आजादी का योद्धा नजर आया तो किसी ने गांधी में सत्य और अहिंसा के रहनुमा दिखाई दिए। किसी ने उनमें पीड़ित मानवता के संत के दर्षन हुए तो कोई उन्हें हिन्दू-मुस्लिम एकता के पैरोकार के रूप में दिखाई दिए। महिलाओं, दलितों और आदिवासियों ने उन्हें अपना सच्चा हितेषी माना था। गांधी एक ऐसे भारत का निर्माण करना चाहते थे, जो बराबरी पर आधारित हो, जिसमें सभलोग परस्पर प्रेम से रहे। सामाजिक सद्भाव, सत्य और अहिंसा उसकी बुनियाद हो, छुआछूत के नाम पर व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य भेद नहीं हो, स्त्री और पुरुष के बीच अंतर नहीं हो। सभी लोग मेहनत, मजदूरी कर अपने जीवन की यात्रा को आगे बढ़ाए। बापू कहते थे कि जो बिना मेहनत के रोटी खाता है तो वह चोरी करता है अर्थात वे सभी के लिए परिश्रम की बात कहते थे।

गांधी एक ऐसे भारत का सपना देखते थे, जिसमें पूंजीपति अपने धन को स्वयं का नहीं मानकर यह समझें कि मैं इसका ‘ट्रस्टी’ हूं तो उस सोच से सामाजिक विकास के एक नए युग का सूत्रपात होगा। ट्रस्टीशिप के सिद्धांत से समाज में शोषक और शोषित की समस्या ही समाप्त हो जाएगी। वे चरखे का प्रयोग शुरू करते हुए बताते हैं कि इससे तैयार हुआ कपड़ा ना सिर्फ  ब्रितानी हुकूमत के लिए चुनौती होगा बल्कि हम भी विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर विकल्प के रूप में खादी पहन सकेंगे। छुआछूत को भारतीय समाज पर कलंक मानते हुए बताया कि जाति के आधार पर व्यक्ति-व्यक्ति के मध्य भेद अमानवीय है। अछुतों को हरिजन उपनाम देते हुए कहा कि जो व्यक्ति पूरे समाज को स्वच्छ रखता है, साफ - सफाई के माध्यम से बीमारियों को दूर करता है, तो वह व्यक्ति अछूत कैसे हो सकते हैं? हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल पक्षधर होने के कारण ही आजादी वाली रात बापू ने दिल्ली की बजाए बंगाल के नोआखली में गुजारी थी, जहां साम्प्रदायिक तनाव ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया था। वे चाहते तो दिल्ली में आजादी के जश्न शमिल हो सकते थे, दिल्ली के तख्त पर बड़े से बड़ा ओहदा संभाल सकते थे, लेकिन उन्होंने लोकतंत्र के मंदिर ‘संसद’ में कदम तक नहीं रखा था। उस दौर में दुनिया के जितने भी राष्ट्रों को आजादी मिली, जिनके नेतृत्व में आजादी की जंग लड़ी गई, उन्होंने सत्ता-प्रतिष्ठान में महत्वपूर्ण पद लिए, लेकिन गांधी ने कोई भी पद स्वीकार तक नहीं किया। भारतीय इतिहास में वर्ष 1920 से जब गांधी युग का आगाज होता है तो गांधी के पैरों की पदचाप पूरी दुनिया सुनती हैं। उनके नेतृत्व में चले तीन बड़े आंदोलन -1920 का असहयोग आंदोलन, 1930 का सविनय अवज्ञा आन्दोलन और 1942 का भारत छोड़ों आन्दोलन ने फि रंगियों के शासन की चूलें हिला दी थी। गांधी ने आंदोलन से पहले गांव-गांव, कूचे-कूचे में धूमकर ऐलान कर दिया था कि आन्दोलन पूरी तरह से अहिंसा पर आधारित होंगे। वर्ष 1922 में असहयोग आन्दोलन धीरे-धीरे अपने उफान पर था, बच्चे, बूढ़े, जवान और क्या महिलाएं? सभी इस आन्दोलन में भागीदारी निभा रही थीं। तभी उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा नामक स्थान पर गुस्साई भीड़ ने पुलिस चौकी को फूंक दिया, इससे आन्दोलन में हिंसा प्रवेश कर गई। गांधी को लगा कि हिंसा का दावानल कहीं भड़क नहीं जाए, इसे रोकने के लिए उन्होंने पूरे उफान पर चल रहे असहयोग आन्दोलन को वापस लेने की घोषणा कर दी थी। उनके इस कदम से कांग्रेस के अनेक चोटी के नेता उनसे नाराज हुए, लोगों ने कहा यदि बापू आन्दोलन को वापस नहीं लेते तो भारत को आजादी के लिए 1947 तक इंतजार नहीं करना पड़ता, लेकिन बापू अपने सिद्धांतों से नहीं डिगे, अविचल राही की तरह निरंतर चलते रहे। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जब अंग्रेजी सरकार ने नमक पर टैक्स लगाया तो बापू अपने चंद साथियों के साथ नमक कानून तोड़ने के लिए निकल पड़े थे। अंग्रेज की संगीने तनी थी, लेकिन वे भी बापू के सिपाही थे, जो बापू के पीछे मौत से बिना डरे चले जा रहे थे। दुनिया के अनेक विद्वान इस तथ्य पर सहमत हैं कि गांधी लोगों के दिलों से डर नाम की ग्रंथी को निकाल ही देते थे, तभी तो गांधी के दौर में तिरंगा लेकर चलने वाले क्रांतिकारी गोली लगने के बाद, तिरंगा नीचे गिरता, उससे पहले दूसरे लोग उसे थाम लेते थे। तिरंगा थामने वाले व्यक्ति को भी यह पता होता था कि अब दूसरी गोली उसका इंतजार कर रही है, लेकिन फिर भी वे तिरंगे को दोनों हाथों में थामे चला करते थे। बहरहाल, गांधी के जीवन पर रामायण का बड़ा असर था, इसलिए वे रामराज्य की कल्पना करते थे, वे रामराज्य के सपने को पंचायतीराज के माध्यम से पूरा करना चाहते थे।

भारतीय संविधान के निर्माण के दौरान पं.नेहरू, सरदार पटेल संविधान की एक पांडूलिपि गांधी के पास लेकर गए तो गांधी ने कहा था कि इसमें पंचायतीराज कहां है? इस पर गांधी नाराज भी हुए थे, बाद में सामुदायिक विकास कार्यक्रम के माध्यम से पंचायतीराज की शुरुआत हुई। राजस्थान के लिए यह खुशी की बात है कि गांधी जयंती के दिन ही पं. नेहरू ने पंचायतीराज का दीपक नागौर की धरती पर जलाया था। बाद के वर्षों में पंचायतीराज को संवैधानिक आधार दिया गया। गांधी का सत्याग्रह आज भी सरकारों से अपनी मांगों को मनवाने का अचूक मंत्र हैं। सत्याग्रह की सभी विधियों में सत्याग्रही सत्य पर चलकर, कष्ट सहनकर अपनी बातों को मनवाता है। जिसमें खिलाफ आन्दोलन कर रहा है, उसके लिए अपने दिल में जरा भी मैल नहीं रखता हैं। आमरण अनशन को गांधी सत्याग्रह का सबसे आखिरी हथियार मानते थे। वे इसके उपयोग करने के लिए चेताते हैं कि आमरण अनशन का रास्ता आखिरी होना चाहिए। महात्मा गांधी ना सिर्फ  भारत की बल्कि दुनिया की अजीम शाख्सियत रहे हैं। गांधी के दक्षिण कांग्रेस में रूचि लेना शुरू किया तो सत्य और अहिंसा के चलते एक दौर ऐसा भी आया, जब बिना गांधी के कांग्रेस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आजादी के संघर्ष में अनेक बार जेल जाए, अनशन किए, लेकिन सत्य और अहिंसा के प्रति अपने आग्रह को नहीं बदला। उन्होंने ग्राम स्वराज्य पर रोशनी डालते हुए कहा कि ग्राम स्वराज्य से मेरी कल्पना है कि वह ऐसा पूर्ण गणतंत्र होगा, जो अपनी मुख्य आवश्यकताओं के लिए अपने पड़ौसी पर निर्भर नहीं रहेगा, बल्कि परस्पर सहयोग से काम लेगा। गांधी लिखते रहे, पढ़ते रहे, चिंतन करते रहे। देश में जागरण के लिए समाचार पत्रों का भी प्रकाशन करते रहे। इसके अलावा देशभर के समाचार पत्रों में भी अपने विचारों की सुगंध से उन्हें महकाते रहे, जिससे देश की आजादी के लिए एक लौ तैयार हो सकें। गांधी बचपन की घटना पर प्रकाश डालते हुए कहते हैं कि शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर जाइल्स विद्यालय का निरीक्षण करने आए थे। उन्होंने पहली कक्षा के विद्यार्थियों की वर्तनी की जांच करने के लिए पहली कक्षा के विद्यार्थियों को अंग्रेजी के पांच शब्द लिखवाए। उनमें एक शब्द केटल था।  मैंने उसके हिज्जे गलत लिखे थे। शिक्षक ने अपनी बूट की नोक मारकार मुझे सावधान किया, लेकिन मैं क्यों सावधान होने लगा? सभी लड़कों के पांचों शब्द सही निकले और अकेला मैं बेवकूफ  ठहरा। शिक्षक ने मुझे मेरी बेवकूफ ी बाद में समझाई, लेकिन मेरे मन पर उनके समझाने का कोई असर नहीं हुआ। मैं दूसरे लड़कों की पट्टी में देखकर चोरी करना कभी सीख न सका।