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Saturday 20th of July 2019
संपादकीय

चुनावी ब्रांड मामला

Monday, April 15, 2019 11:20 AM
सुप्रीम कोर्ट

लोकसभा चुनावों के चलते राजनैतिक दलों को दिए जाने वाले चंदे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण अंतरिम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्टेट बैंक ऑफ इण्डिया द्वारा जारी किए जाने वाले चुनावी बांडों को खरीदने वाले लोगों के नाम-पते चुनाव आयोग को दिए जाने को कहा है। साथ ही यह भी बताने को कहा है कि किस कंपनी या व्यक्ति ने किस राजनीतिक दल के पक्ष में बांड खरीदे हैं। हालांकि अदालत ने चुनावी बांड के माध्यम से राजनीतिक दलों को धन देने पर रोक तो नहीं लगाई है परन्तु उसने इस योजना में पारदर्शिता लाने को जरूरी समझा है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने आगामी 30 मई तक सारा ब्यौरा चुनाव आयोग को सौंपने का आदेश दिया है।

अदालत ने केन्द्र की इस दलील को स्वीकार नहीं किया कि उसे इस समय चुनावी बांड योजना में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और चुनाव के बाद ही इस मुद्दे की विवेचना की जानी चाहिए। अदालत ने कहा कि वह चुनावी बांड योजना के अनुरूप कानूनों को लाने के मकसद से आयकर कानून, जन प्रतिनिधित्व कानून और वित्त कानून आदि में किए गए संशोधनों पर विस्तार से गौर करेगी और यह सुनिश्चित करेगी कि किसी एक राजनीतिक दल को ओर इसका झुकाव न हो। दरअसल, यह बांड योजना घोषित होने के बाद से ही विवादित चली आ रही है।

इसे गोपनीयता के दायरे में लिया गया है ताकि जनता सच को नहीं जान सके। भाजपा को छोड़कर कई राजनीतिक दलों ने इस पर सवाल खड़े किए हैं, जिन्हें बांड के जरिए दान नहीं मिल रहा है। अदालत का ध्यान इस ओर गया है कि सत्ताधारी दल इसका अधिक फायदा ले रहा है। बांड योजना के पहले चरण में ही सिद्ध हो गया है कि इसका अधिक लाभ सत्ताधारी दल को ही मिलेगा। फिर दान और दानदाता के बारे में सूचना केवल जनता के लिए गोपनीय रहती है। बैंक और सरकार को यह अच्छी तरह से पता रहता है कि कौन किसको धन दे रहा है।

आज जो दल सत्ता में नहीं है, कल वह सत्ता में आएंगे तो वह भी जान जाएंगे कि पिछली सरकार को कौन कितना धन दे रहा था। हमें समझना होगा कि ऐसी गोपनीयता अच्छे लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। फिर इससे दानदाता की भी मुश्किलें बढ़ती हैं। बेशक, इस बांड योजना को काले धन के प्रयोग में कमी लाने और राजनीतिक चंदे को वैध बनाने के मकसद से लाया गया है, लेकिन याचिकाकर्ताओं की आपत्ति है कि ऐसा हो नहीं रहा है। जानकारों के अनुसार फर्क केवल इतना पड़ा है कि पहले चंदा नगद मिलता था और अब बांड के माध्यम से मिलता है, गोपनीयता पहले भी थी और आज भी है। जाहिर है कि ऐसी गोपनीयता अतार्किक है, जिसका बचाव सोच-समझकर किया जा रहा है।

राजनीतिक लेन-देन में पारदर्शिता यदि नहीं होगी, तो राजनीतिक आखिर कितनी विश्वसनीय होगी। और अदालत के विचारार्थ यही मुद्दा अहम होगा। हमारे देश में राजनीतिक पार्टियां सूचना के अधिकार के हादरे में नहीं आती। वे चंदा लेकर सेवा का दावा करती है, लेकिन उपभोक्ता कानूनों के दायरे में नहीं आती। अभी हमें राजनीति और चुनाव सुधार की दिशा में और आगे बढ़ना है और यह अब समय की मांग भी है।

राजनीति आज पैसे का खेल हो गया है। बिना धन के राजनीति और राजनीतिक दलों का संचालन नहीं किया जा सकता। यह किसी से छिपा नहीं है कि छोटे-बड़े राजनीतिक दल चुनावों में पानी की तरह पैसा बहाते हैं। यह कालेधन का ही पैसा होता है। कोई भी दल चंदे की पारदर्शिता को लेकर सहमत नहीं है। अब मामला अदालत में है तो देखना है कि बांड योजना का क्या भविष्य बनता है?