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Saturday 20th of July 2019
खास खबरें

मदर्स डे विशेष : मां ये जीवन ही तुमसे है

Thursday, May 09, 2019 12:40 PM
कोटा । साथ छोड़ देती है दुनिया पर वो साथ चलती है , कैसे भी हो हालात  मां कभी नहीं बदलती है। जन्नत है मां के पैरों में क्यों छोड़ कहीं और जाऊं मैं, मेरे सिर पर साया बना रहे हर पल बस यही मनाऊं मैं। दुनिया में तेरे प्यार का कोई तोल नहीं,तेरे अहसानों का मां दुनिया में कोई मोल नहीं। 
 
मां एक शब्द ही नहीं है, इस शब्द में पूरा संसार समाया हुआ है। मां की परिभाषा का क्षेत्र सीमित नही है वो तो असीमित है किसी समंदर की तरह। जैसे दुनिया भर की अच्छाई बुराई समंदर अपने में समेट कर लहरों  की तरह बहता जाता है वैसे ही मां अपने सारे दु:ख दर्द अपने सीने में समेट कर अपना फर्ज निभाती जाती है।  एक छोटा सा बच्चा जिसकी जुबान को केवल मां ही समझती है। भगवान ने ये कला सिर्फ मां को ही दी है। मां हर समय अपने बच्चों के प्रति चिंतित रहती है। वो हमे जीवन के युद्ध से लड़ने की कला भी सिखाती हैं। मां जिंदगी का विश्वास होती है,  जीवन का संबल होती है,  जीवन का सराहा होती है, मां जीवन का सार होती है।  भारत में 'मां' को 'शक्ति' का रूप माना गया है और वेदों में 'मां' को सर्वप्रथम पूजनीय कहा गया है। इंसान के जीवन में वैसे तो हर रिश्ता अनमोल होता है लेकिन किसी मां के साथ उसके बच्चे का रिश्ता सबसे खूबसूरत होता है ।  मां शब्द में ही अथाह प्रेम और समर्पण की भावना छिपी हुई है। मां वह ताकत है, जिसे किसी भी मुसीबत में हम सबसे पहले पुकारते हैं। बिना मां के हमारे अस्तित्व की कल्पना करना नामुमकिन है। मां के बलिदान और त्याग की बात की जाए तो शब्दों में इसे बयां नहीं किया जा सकता। मां का त्याग, बलिदान, ममत्व एवं समर्पण अपनी संतान के लिए इतना विराट है कि पूरी जिंदगी भी समर्पित कर दी जाए तो मां के ऋण से उऋण नहीं हुआ जा सकता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान हर किसी के साथ नहीं रह सकता इसलिए उसने मां को बनाया। मां नाम है संवेदना, भावना और अहसास का। मातृत्व की छाया में मां न केवल अपने बच्चों को सहेजती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसका सहारा और शक्ति बन जाती है। समाज में मां के ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जिन्होंने अकेले ही अपने बच्चों की जिम्मेदारी निभाई। मां की ममता और उसके आंचल की महिमा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ महसूस किया जा सकता है।
 
मां अपने बच्चो के लिए हर मुश्किल को पार करने के लिए तैयार रहती है। सारी परेशानियां उठाकर वे बच्चों को अच्छी तालीम देने में ही लगी रहती है ।  विपरीत परिस्थिति भी उनका हौसला नहीं डिगा सकती । खुद की ख्वाहिशें छोड़ बच्चों के सपने पूरे करने में लगी रहती है। फिर हालात कैसे भी क्यों न हो। ऐसी ममतामयी मां  समाज के लिए मिसाल हैं। ऐसी मां अकेले दम पर अपने बच्चों को बेहतर परवरिश दे रही हैं। हालांकि इस सफर में उन्हें काफी दिक्कतों का सामना भी करना पड़ा लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। जिन्दगी के फाइनेंशिल, सोशल, इमोशनल हर स्तर पर उनको बहुत मजबूत होना पड़ा । इसके बावजूद उन्होंने अपने बच्चों का भविष्य संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी । जीवन में कई उतार चढ़ावों के बाद मां और भी मजबूत हो जाती है।
 
12 मई को मदर्स डे के अवसर पर बच्चों से दैनिक नवज्योति ने जाना कि वो अपनी मां के संघर्ष के बारे में क्या सोचते है। जिन्होंने विपरीत हालातों में भी अपना हौसला नहीं खोया और अच्छे से परवरिश कर जिम्मेदार इंसान बनाया । जिससे वो जिन्दगी में एक मुकाम हासिल कर सके। 
 
लेफ्टिनेंट क्षितिज शर्मा  का कहना है बहुत छोटी उम्र में ही जब मैं 9 माह का था,मैंने मेरे पिताजी को खो दिया था। मुझे उनके बारे में कुछ याद नहीं। मेरे लिए मेरी मां ही मेरी मॉम - डैड है। जब भी मुझे मेरे मित्रों ने पूछा कि क्या तुम अपने डैडी को मिस करते हो मेरा एक ही जवाब रहा कि मुझे मेरी मम्मा ने कभी कोई कमी महसूस ही नहीं होने दी। वो मेरे साथ हमेशा एक साये की तरह रही है। जो लोग नारी को अबला मानते हैं, सोचते हैं वो अपने पति बिना कुछ भी नहीं है उनसे कहना चाहता हूं कि नारी को सिर्फ एक लक्ष्य की जरूरत होती है, वह मिलते ही वह पूरी लगन से उसे पूरा करने में जुट जाती है, उसमें अदम्य साहस होता है वो किसी भी ऊंचाई को छू सकती है। मेरी मां के लिए मैं ही सबसे बड़ा लक्ष्य था। उनका  सपना था कि अगर मेरे पिताजी ( शहीद सुभाष शर्मा,जो कि सीमा सुरक्षा बल में अॉफिसर थे, मरणोपरांत उनकी वीरता के लिए उन्हें राष्ट्रपति के पुलिस पदक शौर्य से सम्मानित किया गया था।) होते तो निश्चित ही मुझे बड़ा आफिसर बनाते और एक अच्छा इंसान बनाते। इसलिए मेरी मम्मा ने भी दिन-रात एक कर दिया और जब तक मैं भारतीय सेना में आफिसर नही बन गया तब तक चैन से नहीं बैठी। मेरी मां ना सिर्फ अपने मुख्य मकसद में सफल रही बल्कि घर के कामों के साथ साथ अपनी गैस एजेंसी को भी बहुत अच्छी तरह संभाला। ...मैं वो पल कभी नहीं भूल सकता जब मैं छोटा था,  मेरी कोच बनकर मेरी मां ने मुझे चाहे स्विमिंग सीखना था, चाहे स्केट्स, चाहे कराटे...पहले स्वयं सीखती फिर मुझे सीखाती । मदर्स डे पर मां के बारे में विचार पूछे तो मां... वो भी एक वीर नारी- वीरांगना , मेरी मां... शब्द अपर्याप्त हैं उनके लिए। 
 
विपिन गुप्ता का कहना है पापा का निधन हुआ तब मैंने इंजीनियरिंग का फर्स्ट ईयर कंपलीट किया था। पापा नया घर बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने पुराना घर गिरा दिया था। इस बीच पापा का अचानक हमारी जिंदगी से चले जाना बहुत बड़ा झटका था। आर्थिक रूप से  मजबूत भी नहीं थे कि घर का निर्माण कार्य पूरा करवा सकें।  तब नाना और मामाजी ने मॉॅरल सपोर्ट किया।  मैं उस समय मुंबई विश्वविद्यालय से इंजीनियरिंग कर रहा था। हम तीन भाई है। मुझसे छोटे भाई का उसी साल इंजीनियरिंग में एडमिशन हुआ था। मम्मी ने हिम्मत रखी और कहा कि तुम लोग अपनी पढ़ाई करो मैं यहां सब देख लूंगी। पापा का सपना था कि बच्चे खूब पढ़ें। नानाजी और मामाजी के सपोर्ट से हमने मेहनत की और मकान बना पाए। मकान में कोचिंग स्टूडेंट को रखा करीब 15 बच्चे थे। उस समय आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि हेल्पर के लिए किसी को रख सकें। मम्मी कोचिंग के बच्चों के लिए खाना पकाती। उनके कमरों की सफाई भी करती । उन्होंने यह सब हमारे लिए किया जिससे हम आराम से पढ़ सकें। हमारे पापा का सपना पूरा कर सकें। मम्मी का ही सपोर्ट और हिम्मत थी कि  तीनों भाई आज अच्छी तरह सैटल है। तीनों ने इंजीनियरिंग किया। उसके बाद एमबीए किया। मैं अहमदाबाद में हूं। एक भाई बंगलूर में और एक मुंबई में है। मम्मी कोटा ही रहती है। वह अभी भी बहुत एक्टिव है। कुछ ना कुछ नया सीखती रहती है।  मम्मी का ऐसा कर्ज है जो हम कभी नहीं चुका सकते है। उनका संघर्षमय जीवन शब्दों में बयां नहीं कर सकते। हम चाहते है कि उनका आशीर्वाद हम पर बना रहे। हमारी यही ख्वाहिश है कि वह सब काम छोड़ कर हमारे साथ रहें।
 
अंकुर गोमे का कहना है वर्ष 2008 में फेमिली प्रॉब्लम्स बढ़ गई थी जिसके कारण पिता का सपोर्ट हट गया था। मां  का इमोशनल सपोर्ट मिला। पिता छोड़ कर चले गए तब संघर्ष शुरू हुआ। बीस साल के वैवाहिक जीवन के बाद दुबारा जिंदगी शुरूना मां के लिए बहुत ही मुश्किल था। मैं उस समय बीकानेर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था। उस कंडीशन में मम्मी ने फाइटर की तरह कमबैक किया। नानाजी ने हर तरह से सपोर्ट किया। शादी के बीस साल बाद मम्मी ने लॉ में एडमिशन लिया और एडवोकेट बनी। वह शादी के बाद पढ़ना चाहती थी पर मेरे पिता का सपोर्ट नहीं था। मां ने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और मुझे अच्छी गाइडेंस भी दी। उन्होंने मुझे कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी। जब मेरी ग्र्रोईंग एज थी तब पिता की तरह सख्ती भी रखी। इकलौती संतान होने से कभी अकेलापन भी महसूस नहीं होने दिया। उन्होंने मां और पिता दोनों की भूमिका निभाई। पिता का फर्ज होता है कि बेटे को गाइड करें उसके भविष्य के लिए प्लानिंग करें यह सब मेरी मां ने किया। मां से पॉजीटिव माहौल मिलता रहा। सोशल वैलफेयर के काम भी मां करती है तो वह मुझे भी इसके लिए मोटीवेट करती है । जब फेमिली डिस्प्यूट चल रहे थे तब मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था। मां ने कभी होपलैस नहीं होने दिया। उनकी हिम्मत, सकारात्मक दृष्टि और बुलंद हौंसले से मुझे हिम्मत मिलती रही। बी.टेक करने के बाद मैं सरकारी नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाएभी फाइट करता रहा। जेवीवीएनएल में जॉब कर रहा हूं।  साथ मैं लॉ की पढ़ाई भी कर रहा हूं। मेरा  लक्ष्य आरजेएस में जाना है। इतनी मुश्किलों के बाद भी मां ने स्वयं पढ़ाई की और मुझे भी अच्छी शिक्षा प्रदान की। यह उनके संघर्ष और मेहनत का ही नतीजा है।
 
मीशा सक्सेना का कहना है जब मैं आठवीं में पढ़ती थी तब एक सड़क दुर्घटना में पापा का निधन हो गया। छोटा भाई उस समय साढ़े चार साल का था। हमारी सारी दुनिया एक पल में बदल गई। जिम्मेदारियां मम्मी के कंधों पर आ गई। हम पर भी गहरा असर पड़ा। हम उम्र से पहले बड़े हो गए। आर्थिक दिक्कत नहीं थी क्योंकि मम्मी की सरकारी नौकरी थी। लेकिन कई छोटे-छोटे काम थे जो उन्हें ही करने पड़ते थे। टेलीफोन, बिजली, पानी के बिल जमा करना। मां ने भी सीखा। मैंने भी सीखा। यह हमें छोटी उम्र से ही सीखना पड़ा। जब परिवार का सपोर्ट नहीं होता तो बहुत मुश्किल हो जाती है। सिर्फ बड़े ताऊजी का सपोर्ट था। मम्मी आॅफिस से दिनभर की थकी आती। घर के सारे काम करती। बाहर के भी उन्हें ही करने पड़ते थे। हम दोनों भाई-बहन को चियर अप करने के लिए  कुछ ना कुछ लेकर आती थी। सैलेरी मिलती तो केक लाती थी। मम्मी बीमार भी थी। हमारी वजह से उन्होंने 6-7 प्रमोशन भी छोड़ दिए थे कि बच्चों को कौन संभालेगा। मम्मी ने पापा की जगह ले ली थी। मैं भी नवीं क्लास से मैच्योर हो गई। मां को संघर्ष करते देखती। धीरे-धीरे मैंने घर का काम संभालना शुरू किया । पढ़ाई पर उन्होंने कभी किसी चीज का प्रभाव नहीं आने दिया। पोस्ट ग्र्रेजएट के बाद मैंने ग्र्राफिक डिजाइनर का कोर्स किया। मैं ग्र्राफिक एण्ड मीडिया डिजाइनर हूं। हमेंशा प्रोत्साहित करती रही। विपरीत परिस्थिति में भी हिम्मत दिखाने की मिसाल बनी। मदर्स डे पर अपनी मम्मी को यही कहूंगी ‘आई लव हूं’ मां। हमारा जिंदगी के हर कदम पर साथ देने के लिए। आपने हमें इतना सक्षम बना दिया है कि लाइफ को जीने के लिए हमें किसी की जरूरत नहीं है।
 
आकांक्षा निर्मल का कहना है घर में आग लगने की दुर्घटना घटित हुई थी। उसमें मेरे मम्मी, पापा और दादी तीनों का देहांत हो गया। तब मैं एक-डेढ़ महीने की ही थी। हम तीन बहनें है। सबसे बड़ी बहिन को दादाजी ने अपने पास रखा। मैं और मुझसे बड़ी बहन नानी के पास आ गए। नानी ने परवरिश की। जबकि नानी की छह बेटियां थी। नानी ने हमें बहुत अच्छी जिंदगी दी। शिक्षित किया। आज मैं बी.एड कर रही हूं। कभी किसी बात की कमी नहीं आने दी। अपनी बेटियों और हममें कभी कोई फर्क नहीं किया। उनके लिए हम बराबर है आज वह समय है जब लोग बेटियां हो जाए तो उन्हें स्वीकार नहीं करते है। हमारी नानी ने हमें उस हादसे के बाद अपने घर ले आई और बेटी की तरह पाला। नानी का प्यार हमें भरपूर मिला। उस समय मेरी दो मौसी अविवाहित थी। एक छोटे बच्चे को मां की जरूरत होती है वह उन दोनों मौसी ने पूरी की। वैसे ही पाला जैसे मां अपने बच्चे को पालती और देखभाल करती है। दोनों मौसियों की शादी हो गई। तब मामाजी मेरी जिंदगी में आई। वह दौर मेरा टीनएजर वाला था। मामीजी ने तब मां की भूमिका निभाई। टीनएज ऐसी उम्र होती है अगर सही मार्गदर्शन ना मिले तो भटक जाते है। लेकिन मामीजी का सपोर्ट, गाइडेंस मिलता रहा। नानी, मौसी और मामीजी तीनों ने जिंदगी और उम्र के हर  पड़ाव पर मां बनकर मुझे संबल , प्यार, अपनापन दिया। इन सबके लिए बराबर मेरे दिल मेंं बहुत सम्मान है। मदर्स डे पर यही कहूंगी कि किसी भी एक स्टेज पर इन तीनों में से कोई नहीं होता तो जिंदगी का दौर बहुत फीका पड़ जाता।  मैं इन तीनों को धन्यवाद करती हूं कि मेरी जिंदगी में हमेशा रहने के लिए , हर समय पर सपोर्ट करने के लिए। कभी यह नहीं पता चला कि मेरे पेरेन्ट्स नहीं है। हर लड़की को मेरी नानी, मौसी और मामीजी जैसी मां मिले।