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Saturday 20th of July 2019
ओपिनियन

किस दल को है चुनाव आयोग का भय

Wednesday, April 10, 2019 11:15 AM
सुनील अरोड़ा (फाइल फोटो)

सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा पत्रों को अपवाद के रूप में आचार संहिता के दायरे में लाने का निर्देश दिया था। कोर्ट का मानना था कि घोषणा पत्र चुनाव से पहले जारी किए जाते हैं, जिससे ये आचार संहिता के दायरे में नहीं आते। लेकिन इनमें किए गए वादे चुनाव के मैदान का संतुलन बिगाड़ते हैं जिसके चलते ही कोर्ट ने आयोग को इस बारे में राजनीतिक दलों के लिए दिशानिर्देश बनाने का आदेश दिया था। आजकल देश में देश की सबसे बड़ी पंचायत लोकसभा के चुनाव का दौर धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। जैसे-जैसे मतदान की तिथि नजदीक आती जा रही है चुनावी प्रचार तेजी पकड़ता जा रहा है। राजनीतिक दल जनता को लुभाने की गरज से लोक-लुभावन नारों, वादों और सब्जबागों से भरे चुनावी पिटारे रूपी अपने चुनावी घोषणा-पत्रों का ऐलान कर रहे हैं। चुनाव आयोग 2015 में ही यह स्पष्ट कर चुका है कि राजनीतिक दल चुनाव में मुफत उपहार और वस्तु देने का वादा नहीं कर पाएंगे। साथ ही उनको यह विस्तार से बताना पड़ेगा कि जो वादे उन्होंने किए हैं, उनको वह कैसे पूरे करेंगे और उनके लिए धनराशि का इंतजाम वह कहां से करेंगे। दरअसल चुनाव आयोग ने साल 2015 में ही चुनाव से पूर्व जारी होने वाले राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्रों को आदर्श चुनाव आचार संहिता के दायरे में ले लिया था। उस समय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को यह निर्देश जारी किया था कि वह अपने चुनावी घोषणा पत्रों की प्रति चुनाव आयोग को आवश्यक रूप से भेजें। यह भी कि मतदाताओं का विश्वास उन्हीं वादों पर हासिल किया जाना चाहिए जिन्हें पूरा किया जाना संभव हो।

उस समय चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को यह निर्देश सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दिए गए आदेशों के बाद दिया था। निर्देश में आयोग ने साफ-साफ कहा था कि राजनीतिक दल मुफ्त उपहार और वस्तुएं देने का वादा न करें। राजनीतिक दलों के जो भी वादे हों वह संविधान के सिद्धांतों के विरुद्ध न हो और आचार संहिता के प्रावधानों के अनुरूप हों। सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा पत्रों को अपवाद के रूप में आचार संहिता के दायरे में लाने का निर्देश दिया था। कोर्ट का मानना था कि घोषणा पत्र चुनाव से पहले जारी किए जाते हैं, जिससे ये आचार संहिता के दायरे में नहीं आते। लेकिन इनमें किए गए वादे चुनाव के मैदान का संतुलन बिगाड़ते हैं जिसके चलते ही कोर्ट ने आयोग को इस बारे में राजनीतिक दलों के लिए दिशानिर्देश बनाने का आदेश दिया था। इसके बाद ही आयोग ने राजनीतिक दलों से विचार-विमर्श किया और विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किए। वह बात दीगर है कि कुछ राजनीतिक दलों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। उन्हें आयोग का यह कदम रास नहीं आया। उनका इस बाबत कहना था कि वोटरों से वादे करना और उनके समक्ष प्रस्ताव रखना हमारा अधिकार है। भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकबी का कहना था कि घोषणा पत्र पार्टी का वोटरों से किया गया वायदा होता है। इसमें आयोग का दखल नहीं होना चाहिए। घोषणा पत्रों पर सेंसरशिप उचित नहीं है। जबकि कांग्रेस के शकील अहमद का कहना था कि इस मुद्दे पर राष्ट्ीय बहस होनी चाहिए। मोदी-केजरीवाल ने जो वायदे किए, उनमें कोई पूरा नहीं हुआ। आयोग के निर्देश के पीछे शायद यही मुख्य वजह है। लेकिन चुनाव आयोग ने तब यह स्पष्ट कर दिया था कि निष्पक्ष चुनाव और सबको समान अवसर देने के लिए वह प्रतिबद्ध है।

देखा जाए तो आज देश के राजनीतिक दल इस सबके बावजूद अपने हिसाब से चुनावी वादे करने में मशगूल हैं। उन्हें न देश की चिंता है, न देश की सुरक्षा की, न देश की आन-बान-शान के प्रतीक राष्टÑध्वज की, न देश की एकता-अखंडता की और न देश की सदियों  पुरानी विरासत सांप्रदायिक सद्भाव की। देश खंड-खंड हो जाए, सामाजिक बिखराव, जातिगत वैमनस्यता, धार्मिक विद्धेष चरम पर पहुंच जाए, इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं। पर्यावरण, प्रदूषण आदि मुद्दों पर तो वह कतई गंभीर हैं ही नहीं। डब्ल्यूएचओ ने बीते साल देश के जिन 14 शहरों को विश्व के सर्वाधिक प्रदूषित शहरों की सूची में शामिल किया था, उनमें अभी हाल तक कोई सुधार नहीं हुआ है। क्लाइमेट ट्रेड की हालिया रिपोर्ट में इस स्थिति के लिए सरकारों के साथ जन प्रतिनिधियों को जिम्मेदार माना है। हालात गवाह हैं कि अभी तक उन शहरों में प्रदूषण निगरानी केन्द्र तक नहीं खुले हैं। राजनीतिक दलों को चिंता है तो बस येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतने की ताकि देश की सत्ता पर वह काबिज हो सकें। इसके लिए वह धर्म, जाति, संप्रदाय यहां तक कि पंथ की राजनीति करने में भी नहीं चूकते। दलों द्वारा क्षेत्र में जातियों के बाहुल्य के मद्देनजर जातियों का गठजोड-गठबंधनÞ और उसी के हिसाब से उम्मीदवारों का चयन इसका जीता-जागता सबूत है। वंचित समूहों और आबादी के हिसाब से नगण्य जातियों की उपेक्षा तो जगजाहिर है। आजादी के बाद से देश की राजनीति में उनकी हिस्सेदारी का तो सवाल ही आखिर कहां उठता है। राजनीतिक दल दावे करने में तो कीर्तिमान बनाते आए हैं। बीते दशक इसके साक्षी हैं। कहने को तो हम विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों की पांत में जा खड़े हुए हैं, अंतरिक्ष में पहुंचने का दावा भी कर रहे हैं लेकिन जो सबसे बड़ी विडम्बना है वह यह कि इस दौरान न तो गरीबी हटी, न बेरोजगारी ही खत्म हुई, न भुखमरी का खात्मा हुआ,, न असमानता मिटी, न समुचित चिकित्सा के अभाव में बेमौत मरने वालों की तादाद में ही कोई कमी आई, न कुपोषण की समस्या का खात्मा हुआ। आज हालत यह है देश में कुपोषण के चलते कमजोर बच्चों की तादाद 34.70 फीसदी है। और तो और न अन्नदाता किसानों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं पर ही अंकुश लगा। दुख की बात यह है कि लोकसभा की कुल 543 सीटों में से यदि शहरी इलाकों की 57 सीटें छोड़ दें तो 342 सीटें ऐसी हैं जो ग्रामीण इलाकों से आती हैं जहां के किसान ही राजनीतिक दलों की किस्मत का फैसला करते हैं। असलियत यह है कि बीते सालों में खाद्यान्न की कीमतों में भारी कमी के चलते किसानों की कमाई में काफी कमी आई है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)