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Sunday 19th of May 2019
ओपिनियन

एक दूसरे से करते हैं प्यार हम...

Wednesday, May 15, 2019 10:05 AM

परिवार व्यक्ति एवं समाज सभी के लिए एक महत्वपूर्ण ईकाई है। गत कुछ दशकों में हुए तीव्र आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक यहां तक कि भौगोलिक स्थितियों में परिवर्तन के साथ विश्वभर की पारिवारिक परिस्थितियों में अहम् परिवर्तन आए हैं तथापि मूल सत्य आज भी यथावत् है कि परिवार हमारी अहम् संस्था है एवं यह संस्था विश्वभर के समाजों का मूलाधार है। व्यक्ति के पास कितनी ही धन-सम्पदा, वैभव-विलास क्यों न हो, वह कितना ही सुशिक्षित, शक्ति सम्पन्न क्यों न हो अगर उसके परिवार में सुख नहीं है, सुकून नहीं है, सौहार्द नहीं है तो उसकी सारी उपब्धियां व्यर्थ है, बेकार हैं।

वह उस नाविक की तरह है जो समुद्र के बीच प्यासा खड़ा है। परिवार हमारे सुख-शांति की अहम् कड़ी है। परिवार हमें ऊर्जा देता है, रिज्युविनेट करता है, हौंसला देता है, स्पोंज की तरह हमारे सारे दु:खों को सोखता है। परिवार हमारे मन के रेचन का उचित प्लेटफार्म भी है। हम सभी परिवार के लिए ही तो दौड़ रहे हैं। एक राजस्थानी कहावत है राई बिना कैसा रायता? परिवार बिना भी व्यक्ति क्या है? परिवारविहीन व्यक्ति त्रिशंकु की तरह अधर में लटक जाता है। परिवार की महत्ता आप उनसे जाकर पूछिए जो अकेले होते हैं एवं जिन्हें बहुत कम लोग रेस्पांड करते हैं।

इसीलिए अगर व्यक्ति का परिवार सुखी है तो वह सुखी है अन्यथा परिवार ही अगर ऊर्जा सोखने लग जाए तो व्यक्ति अवसाद में चला जाता है। परिवार खूंटा है, जीने का अवलम्ब है। निजता, वैयक्तिक स्वतंत्रता एवं सूडो इंडिविजुअलिटी के नाम पर आज व्यक्ति अकेलेपन में सिमटता जा रहा है। अकेलेपन के इस दुर्गम अरण्य को भोगते-भोगते वह भीतर से टूट गया है। उसे आज पुन: परिवार पुकार रहा है एवं वह सुबह का भूला शाम को घर आए की तर्ज पर समूह/परिवार में जीने की महत्ता समझ चुका है।

उसे अब पता चला है कि किस तरह पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण, टीवी, इण्टरनेट, फेसबुक, वाट्सअप आदि संस्कृति ने उसे बर्बाद कर दिया है। वह अपने ही घर में बेगाना हो गया है। यह बात हमारे देश पर ही नहीं विश्वभर में लागू होती है। हठधर्मिता, अति महत्वाकांक्षा के चलते  सर्वत्र परिवार टूटते जा रहे हैं। यूएनओ ने इस स्थिति का आकलन बहुत पहले कर लिया था, वर्षों मनन-चिंतन के पश्चात् उन्होंने वर्ष 1994 से प्रतिवर्ष 15 मई को ‘अन्तरराष्टय परिवार दिवस’ के रूप में मनाने का न सिर्फ संकल्प लिया एवं इस हेतु वांछित प्रस्ताव भी पास किया। तब से अब तक प्रतिवर्ष पारिवारिक विकास हेतु एक थीम तैयार कर ‘परिवार दिवस’ पर विश्वभर में कार्यक्रम किए जाते हैं।

इस वर्ष अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस का थीम ‘फैमिली एण्ड क्लाइमेट एक्शन’ परिवार के आर्थिक, शैक्षिक विकास की तो वकालत करता ही है, उन परिवारों के लिए भी विशेष चिन्तन एवं सहयोग की बात करता है जो अत्यन्त दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इन इलाकों के लोग दिन- रात अनेक कठिनाइयों को झेलते हैं। भारत की बात करें तो पहाड़ी, मरू प्रदेशों, दुर्गम वन क्षेत्रों आदि में रहने वाले  परिवार न सिर्फ आर्थिक स्तर पर कठोर जीवन यापन करते हैं, उनके बच्चों को शिक्षार्जन में भी बहुत दिक्कतें आती हैं।

पहाड़ी क्षेत्र के बच्चे नदियों, पुलों तक को पार कर विद्यालय जाते हैं। यहां स्वास्थ्य सेवाएं भी बहुत कम हैं। हमें न सिर्फ  वांछित सुविधाएं उपलब्ध कर इन बच्चों को प्रेरणा देनी है, उनके आर्थिक स्तर को भी ऊंचा उठाना है। हमारे पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री नदी पार कर स्कूल पढ़ने जाते थे, भारत के दुर्गम स्थानों पर भी ऐसे अनेक लाल हैं जो इन विषमताओं को नित्य प्रतिदिन झेलते हैं हालांकि तब से अब तक स्थितियों में बहुत परिवर्तन हुए हैं पर अब भी बहुत कुछ किया जाना शेष है।

परिवार को मजबूती देने के लिए स्त्री की स्थिति में भी आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है। स्त्री परिवार की धूरी है। हमारा दुर्भाग्य है कि आजादी के इतने दशकों बाद भी हमारा लिंगानुपात स्त्री के प्रतिकूल है। इतना होने पर भी आज भू्रण हत्या, स्त्री प्रताड़ना एवं आम घरों में बेटियों की वही दुर्दशा है जो पहले थी। आज भी इन बेटियों के विवाह पर खुलेआम दहेज मांगा जाता है एवं बेटे के पिता इस तथ्य को कह तक नहीं पाते कि हमारी बेटी उतनी ही शिक्षित है जितना आपका बेटा। वस्तुत: हमारी सारी प्रथाएं प्रारम्भ से ही स्त्री विरोधी हैं। हम स्त्री की उपलब्धि को उपलब्धि ही नहीं मानते, ऐसे में सुखी परिवार की कल्पना आकाशकुसुम, झूठे मंसूबों के अतिरिक्त क्या हो सकती है ?

सहअस्तित्व, सहयोग एवं आपसी समझ पारिवारिक सुख के नींव-प्रस्तर हैं। यह समझ देशज ही नहीं वैश्विक बनें। कोई भी एवं कहीं भी एक टूटा हुआ परिवार विश्वभर के परिवारों को कहीं न कहीं तोड़ेगा। प्रेम, सौहार्द एवं भाईचारे का विराटभाव ही विश्वभर के परिवारों की शांति का सहज सोपान बनेगा। सदियों पूर्व हमारे देश में गूंजा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का उद्घोष अब वैश्विक उद्घोष बनें। आलेख की समाप्ति पर मुझे वर्ष 1991 में प्रदर्शित आनन्द बख्शी के लिखे ‘हम’ फिल्म के गीत  के अंश याद हो आए हैं जो पारिवारिक स्रेह, सौहार्द को तो प्रतिष्ठापित करते ही हैं, परिवार की महत्ता भी रेखांकित करते हैं। उदितनारायण, अल्का याग्निक एवं टीम ने इसे बहुत सुंदर गाया है:

इक दूसरे के पहरेदार हम,
इक दूसरे के लिए बेकरार हम,
इक दूसरे के लिए मरना पड़े तो है तैयार हम....इक दूसरे से करते है प्यार हम।

- हरिशंकर राठी