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Sunday 19th of May 2019
ओपिनियन

शासक पार्टी की बल्ले-बल्ले

Wednesday, May 15, 2019 10:15 AM

हाल ही में 12 अप्रैल 2019 को एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफोमर्स की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, ‘‘इलेक्टोरल बॉण्ड- चुनाव प्रक्रिया की पवित्रता को अप्रत्याशित रूप से प्रभावित करते हैं- यह कहते हुए राजनीतिक पार्टियों को निर्देशित किया कि वे अविलम्ब ऐसे डोनर्स (दानदाता) की पूरी जानकारी तथा उनके द्वारा दी गई राशि का पूर्ण ब्यौरा एक सील्ड कवर (बंद लिफाफे) में 30 मई 2019 तक चुनाव आयोग को प्रस्तुत कर दें- बैंक अकाउन्ट की भी जानकारी दें जहां बॉण्ड की राशि जमा की गई है।

सरकार का पक्ष- सरकार की ओर से एटोरनी जनरल ने सरकार का पक्ष रखते हुए दावा किया कि- बोण्ड्स चुनाव में कालेधन के बेतहासा इस्तेमाल पर लगाम कसेंगे और कि राजनीतिक डोनेशन के बॉण्ड जारी करने वाली एक मात्र संस्था स्टेट बैंक व उसकी अधिकृत शाखाएं हैं- जिनको दानदाता (बॉण्ड खरीदने वाले) की पूरी पहचान है, जो बैंक के पास गोपनीय रहेगी। वे केवाईसी (अपने ग्राहक की पहचान) की प्रक्रिया के जरिए दानदाता का पूरा ब्यौरा जान लेने के उपरान्त ही चुनावी बॉण्ड जारी करते हैं- इस प्रक्रिया में पूरी पारदर्शिता है, जवाब देही है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने यह तर्क भी रखा कि मतदाता को राजनीतिक चन्दों की जानकारी देने का कोई अधिकार नहीं है- जानकारी देने से दानदाता की निजता (प्राइवेसी) का हनन होता है तथा उन्हें प्रताड़ित होने का भय व संभावना बनी रहती है जो उनको मानसिक वेदना दे सकता है इस वजह से ही चुनावी बॉण्ड योजना में डोनर्स के नाम गुप्त रखने का प्रावधान किया गया है।

कोर्ट का इस मामले में दखल करना अनुचित है क्योंकि इसका क्षेत्राधिकार मात्र एग्जीक्यूटिव को ही है और कि कोर्ट का कोई भी आदेश चुनाव प्रक्रिया में कालेधन के उपयोग में इजाफा करेगा। यह भी कि चुनावी बॉण्ड पर दानदाता का नाम नहीं होता है ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनुपालना करते हुए दानदाताओं के नाम बताना राजनीतिक पार्टियों के लिए कठिन होगा। सरकार के उपर्युक्त पक्ष से लगता नहीं है कि पह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनुपालना करा पाएगा।

बॉण्ड योजना के अनुसार कोई भी व्यक्ति या कारपोरेट संस्था या विदेशी कम्पनी जो भारत में कार्यरत है एक हजार रुपए से लेकर एक करोड़ रुपए तक की राशि का चुनावी बॉण्ड खरीद कर अपनी मन चाही राजनीतिक पार्टी को चन्दे के रूप में दे सकती है। ये बॉण्ड मात्र स्टेट बैंक व उसकी शाखाओं द्वारा ही जारी किए जा सकते हैं। बॉण्ड में दानदाता का नाम नहीं होगा, वह बैंक के पास गोपनीय रहेगा।

वैद्यता- चुनावी बॉण्ड बियरर चैक जैसे होते हैं लेकिन जारी किए जाने पर 15 दिन की अवधि तक ही वैद्य रहेंगे, उसके बाद जमा करने पर बॉण्ड्स की दान राशि पार्टी को नहीं मिल सकेगी। जिस दिन पार्टी अपने बैंक खाते में बॉण्ड जमा कराएगी उसी दिन उस पार्टी के खाते में बॉण्ड की राशि जमा कर दी जाएगी। पात्रता- कौनसी राजनीतिक पार्टी चुनावी बॉण्ड द्वारा चन्दा पाने की पात्रता रखेगी?

वह राजनीतिक पार्टी जिसने गत चुनावों में (लोकसभा या विधानसभा) डाले गए मतों का कम से कम एक प्रतिशत मत प्राप्त किया है तथा जो जन प्रतिनिधित्व कानूनी 1951 की धारा 29 अ के तहत रजिस्टर्ड है- वही इलेक्टोरल बॉण्ड द्वारा चन्दा प्राप्त करने के लिए पात्र होगी। चन्दे की सीमा- कम्पनी कानून में कम्पनियों पर यह अंकुश था कि वह बिना शेयर होल्डरों को सूचित किए तीन साल के अपने औसत लाभ का 7.5 प्रतिशत तक ही डोनेट कर सकती थी- यह सीमा थी जिसे 2017 के वित्त बिल द्वारा निरस्त कर दान की राशि की सीमा असीमित कर दी गई है। जिससे अब नई कम्पनियां, घाटे में चल रही कम्पनियां तथा विदेशी कम्पनियां भी डोनेट कर सकती हैं।

चुनावी बॉण्ड खरीददार का नाम या डोनेशन प्राप्त करने वाली पार्टी का नाम गोपनीय रहेगा- इसकी जानकारी चाहने का किसी को अधिकार नहीं होगा। यथार्थ में तो चन्दा देने वाला और लेने वाली पार्टी आपस में सब कुछ जानते हैं।
कैसी विडम्बना है कि सरकार गोपनीयता रखने को पारदर्शिता बता रही है और कि इससे कालेधन के उपयोग पर अंकुश लगेगा।

अनुभव ने सरकार की सारी दलीलें खारिज कर दी हैं- यथार्थ में आज तो स्थिति यह है कि विशेषकर शासक पार्टी तथा अन्य पार्टियां भी चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित चुनाव खर्च सीमा को दरकिनार कर कालाधन की नदियां बहाकर चुनाव लड़ रही हैं। हाल ही में प्रकाशित समाचारों के अनुसार सालभर में मार्च 2019 तक स्टेट बैंक द्वारा कुल 2772 करोड़ के चुनावी बॉण्ड जारी किए गए हैं इसकी आधी राशि के बॉण्ड मात्र मार्च 2019 के 15 दिनों में बिके हैं (यानि कि चुनाव प्रक्रिया जारी होने के दौरान) ये बॉण्ड एक-एक करोड़ के डोनेशन के हैं।

बिजनेस स्टेण्डर्ड के अनुसार 2019 वर्ष में टाटा ग्रुप ने 500 से 600 करोड़ का चन्दा दिया है जबकि वर्ष 2014 में यह मात्र 25 करोड़ था उसके अनुसार 500-600 करोड़ की राशि में से 300-350 करोड़ का चन्दा बीजेपी का अनुमानित है। कांग्रेस को 50 करोड़, शेष बची राशि में टीएमसी, सीपीआई, सीपीएम व एनसीपी हैं। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुनावी बॉण्ड योजना शासक पार्टी के लिए किंग मिदास का खजाना साबित हो रही हैं।

इससे स्पष्ट है कि शासक पार्टी जो कि अधिकतम दान राशि प्राप्त कर रही होगी अपने चहेते दानदाताओं को गैर मुनासिब फायदे पहुंचाएगी तथा नीति निर्माण में कारपोरेट दानदाता घरानों की प्रभावी दखल होगी। इससे यह सन्देश भी जाएगा कि हमने हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को कारपोरेट घरानों के हाथों की कठपुतली बना दिया है। जो आम जन के हितों को नजर अन्दाज करेगी।

- डी.एल. त्रिपाठी