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Sunday 19th of May 2019
ओपिनियन

पाठ्यक्रमों में बदलाव

Wednesday, May 15, 2019 11:10 AM

थानागाजी सामूहिक बलात्कार-कांड को लेकर गरमाया राजनीतिक बवेला, अभी शांत हुआ भी नहीं था कि विद्यालयीय पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर प्रदेश में नया सियासी-बखेड़ा उठ खड़ा हुआ है। इस नए विवाद के केंद्र बिंदु में अब स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर आ गए हैं। पुस्तक है-कक्षा दस की सामाजिक विज्ञान। इसके तीसरे पाठ-‘अंग्रेजी साम्राज्य का प्रतिकार एवं संघर्ष’ इसमें वीर सावरकर के बारे में यह नया तथ्य जोड़ा गया है कि आजादी के संघर्ष में वे जेल गए, कठोर सजा भी भुगती, लेकिन वे जेल के कष्टों से टूट गए। बाद में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने अपनी रिहाई के लिए ना केवल एक बार, बल्कि तीन-तीन बार दया याचिकाएं पेश की थीं।

इन बदले गए तथ्यों के बारे में शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा का कहना है कि पूर्ववर्ती भाजपा सरकार ने पाठ्यक्रम में बदलाव करते हुए ऐसे लोगों को जोड़ा जिनका स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं रहा था। वीर सावरकर जैसे लोगों को महिमा मंडित कर दिया। इसकी समीक्षा की गई। जिन शिक्षाविदों ने यह पाठ लिखा है, उनके पास प्रमाण हैं। उन्होंने सोच-समझकर लिखा है। हमने सावरकर का कोई अपमान नहीं किया है। इसके जवाब में भाजपा शासन में शिक्षा राज्य मंत्री रहे वासुदेव देवनानी का आरोप है कि कांग्रेस हिंदुत्व विरोधी मानसिकता वाली पार्टी है।

जो सावरकर जैसे राष्टभक्त की उपेक्षा करती आई है। पाठ्यक्रम में बदलाव के माध्यम से वह इस स्वतंत्रता सेनानी के बारे में गलत तथ्यों से बच्चों को पढ़ाना चाहती है। पूर्व शिक्षा मंत्री कालीचरण सराफ और पूर्व सामाजिक अधिकारिता मंत्री मदन दिलावर ने इसे अपमानजनक कृत्य बताया। इस प्रकरण से पूर्व भाजपा शासन दौरान पाठ्य-पुस्तकों में अकबर की जगह महाराणा प्रताप को महान बताने और आधुनिक भारत के निर्माण में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के योगदान कोे कुछ पंक्तियों में ही समेटने को लेकर भी प्रदेश में काफी राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ था। लेकिन अब इस बदलाव से सियासी माहौल में आए उबाल ने कई सवालों को खड़ा कर दिया है।

क्या शासन के बदलने के मायने, शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में बदलाव लाना भर रह गया है? क्या बदलाव, राजनीतिक दलों की विचाराधारा के अनुरूप होने चाहिए? किए गए बदलाव से आम अवाम का कोई हित पूरा होने वाला है? क्या राजनीतिक दल अपने राजनीतिक एजेंडा के अनुसार नई पीढ़ी को पढ़ाना-लिखाना चाहते हैं? पिछले पांच साल और अब आने वाले पांच सालों में पढ़ने वाले छात्रों के ज्ञान अर्जन में जो भ्रम की स्थिति बनेगी, उसके भावी परिणाम क्या होंगे? सवाल तो यह भी उठता है कि  ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तित्वों के आकलन कितने तथ्यात्मक और प्रामाणिक हैं? इस कसौटी पर आंकने का दायित्व क्या शिक्षाविदों का है या इतिहासवेत्ताओं का?

इतिहास के बारे में विचार करें, तो सहसा हमारे पूर्व राष्टपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के यह शब्द कौंधते हैं-इतिहास देखना नहीं, चिंतन भी है। चिंतन सदैव रचनात्मक होता है, चाहे सर्जनात्मक ना भी हो। इतिहास-लेखन सर्जनात्मक क्रिया है। यह इतिहासपरक अनुसंधान से भिन्न है। यदि राजनीति पर गौर करें, तो चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य के शब्दों के अनुसार-राजनीति मानवीय कार्य-व्यापार का विज्ञान है, केवल शासन-संबंधी कौशल नहीं। कुछ राजनीतिज्ञ दलीय राजनीति के अतिरिक्त और किसी राजनीति को नहीं जानते। ऐसे में पाठ्यक्रम बदलाव पर गरमाई राजनीति पर मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी का शेर अर्ज है

दुनिया को इंकलाब की याद आ रही है आज
तारीख अपने आप को दोहरा रही है आज।

- महेश चन्द्र शर्मा