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Thursday 19th of September 2019
ओपिनियन

कांग्रेस के दक्षिण की ओर कदम

Monday, May 27, 2019 09:40 AM
राहुल गांधी (फाइल फोटो)

अगर केरल और तमिलनाडु सहित कुछ अन्य राज्यों ने साथ नहीं दिया होता तो  नव निर्वाचित लोकसभा में कांग्रेस की सदस्य संख्या वर्तमान सदस्य सख्या से लगभग आधी ही रह जाती। इसमें भी सबसे अधिक योगदान केरल का रहा। यह भी कहा जाने लगा है कि अगर पार्टी के नेतृत्व ने बड़े स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम नहीं किया तो धीरे-धीरे देश की कभी सबसे बड़ी और  सबसे पुरानी सियासी पार्टी कांग्रेस केवल दक्षिण भारत तक ही सीमित हो जाएगी।

दक्षिण के दो राज्यों केरल और कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी संगठन अभी भी काफी हद तक बना हुआ है यद्यपि इसमें  गुटबंदी  बनी रहती है। लेकिन इसके बावजूद  केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतान्त्रिक मोर्चा  और वाम मोर्चा हर पांच साल बदल-बदल कर सत्ता में आता रहा है। दोनो मोर्चों के बीच जीत हार का अंतर केवल कुछ सीटों तक ही सिमित रहता है। 2014 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को यहां कुल 8 सीटें मिली थी। जबकि इन चुनावों में इसे 15 सीटें मिली है और इसके मोर्च ने कुल  मिलाकर  20 में से 19 सीटों पर कब्जा किया है।

हालांकि पार्टी के बड़े नेताओं का एक वर्ग  इस बड़ी जीत का श्रेय पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को देता है। उनका कहना है कि अगर राहुल गांधी ने राज्य वायनाड लोकसभा चुनाव क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ा होता तो पार्टी को शायद ही इतनी अधिक सीटें मिली होती। पर राज्य में पार्टी अधिकतर नेता और कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग इसका श्रेय राज्य नेतृत्व को देता है। इसमें भी अधिक लोग यह मानते है कि राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चंडी और कुछ अन्य नेताओं की मेहनत  से पार्टी को राज्य में इतनी अधिक सीटें मिली है।

लोकसभा चुनावों से कुछ माह पूर्व राज्य के सबरीमाला मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश का मामला एक बड़ा   मुद्दा बन गया था। लगभग 800 साल पुराने इस मंदिर में पारम्परिक रूप से 10 से 50 साल की उम्र वाली महिलाओं के प्रवेश पर निषेध है। लेकिन पिछले नवम्बर महीने में सर्वोच्च  न्यायलय ने इस प्रतिबंध को समाप्त कर दिया था। इसको लेकर यहां के हिन्दू संगठनों ने एक बड़ा आन्दोलन शुरू किया था। बीजेपी इस आन्दोलन  में सबसे आगे थी। सत्तारूढ़ वाम मोर्चा इस मामले में न्यायालय के आदेश को लागू करने के लिए कटिबद्ध था। बीजेपी और राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ को लगता था कि इसे मुद्दा बनाकर वह लोकसभा चुनावों में लाभ उठा सकता है।

उसी समय राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस पार्टी न्यायलय के आदेश साथ है तथ इस मत की है कि इस मंदिर में सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश करने दिया जाए। लेकिन कांग्रेस की केरल इकाई इस मामले पर अपना रुख  दूसरा  रखा। यहां के नेताओं का कहना था कि इस मुद्दे पर मंदिर की परम्पराओं को बरकरार रखा जाए। राज्य पार्टी के नेता इस पर रुख पर आखिर तक बने रहे। बीजेपी को लगता था को इस बार वह इस मुद्दे को लेकर राज्य की राजधानी की लोकसभा सीट सहित एक आध और सीट पर जीत सकती है लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

राज्य में ईसाईयों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है और वे आमतौर पर कांग्रेस का साथ देते रहे है। चूंकि सबरीमाला  मंदिर मुद्दे पर हिन्दुओं का एक बड़ा वर्ग वाम मोर्चे की सरकार और खासकर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से नाराज था  इसलिए यह वर्ग सरकार और वाम मोर्चे के विरोध में उतर आया। चूंकि राज्य में बीजेपी के जीतने की संभावनाएं बहुत कम थी इसलिए उन्होंने  इसे चुनने के बजाए कांग्रेस का साथ देने को बेहतर समझा और यही एक बड़ा कारण था कि यह पार्टी और इसका मोर्च मोर्चा राज्य की अधिकांश  सीटों पर कब्जा करने में सफल रहा।

तमिलनाडु में वहां की राजनीति पर दो क्षेत्रीय दलों द्रमुक और अन्न्द्रमुक का वर्चस्व रहा है। राष्टÑीय पार्टियों की उपस्थति यहां कम है। कांग्रेस की द्रमुक से दोस्ती पुरानी है। इसलिए  उसने उसके साथ गठबंधन किया। हालांकि इस समझौते में उसे 39 में मात्र 9 सीटें ही मिली लेकिन उसके पास इसे मानने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। उधर द्रमुक ने अपने हिस्से की कुछ सीटें दोनों वामपंथी पार्टियों को दी। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के साथ बीजेपी का समझौता हुआ और उसे केवल पांच सीटें ही मिली। जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था। एक दो सीटों को छोड़कर अन्नाद्रमुक सभी के लोकसभा   सीटों पर हार गई। कांग्रेस अपनी 9 सीटों में से 8 सीटें जीतने में सफल रही। यह माना जा रहा है कि कांग्रेस को अपने बल की बजाए द्रमुक के समर्थन के कारण ये सब सीटें मिली हैं।

कर्नाटक में  पिछले एक साल से कांग्रेस, जनता दल-स की सरकार हैं। दोनों दलों ने मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ा था। इसलिए लग रहा था कि इस बार राज्य में बीजेपी, जिसे 2014 चुनावों में कुल 28 में से 17 सीटें मिली थी, की सीटें कुछ कम हो सकती है। 2014 के चुनावों में कांग्रेस को 9 और जनता दल-स को 2 सीटें मिली थी। कांग्रेस और जनता दल-स का सीट समझौता कभी जमीनी स्तर पर नहीं   उतरा। ना तो कांग्रेस के  नेताओं ने जनता दल-स के उम्मीदवारों के लिए कम किया और ना ही जनता दल-स के नेताओं ने  कांग्रेस के उम्मीदवारों के लिए काम किया। फल यह निकला  बीजेपी 26 सीटों पर कब्जा करने में सफल रही।

अगर इस राज्य में दोनों दलों ने ईमानदारी से एक दूसरे के लिए कम किया होता कांग्रेस को अधिक सीटें मिलती और लोकसभा में पार्टी का आंकड़ा 55 से ऊपर चला जाता। लोकसभा में मान्यता प्राप्त विपक्ष का नेता बनने के लिए कम से कम इतनी सीटें चाहिए। राज्य कांग्रेस ने 20 तथा जनता दल-स ने 8 सीटों पर चुनाव लड़ा था। पर दोनों दलों को केवल एक-एक सीट ही मिली। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री और जनता दल के सुप्रीमो एचडी देवेगौडा भी तुमकर से चुनाव हार गए।
 

- लोकपाल सेठी