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Thursday 20th of June 2019
ओपिनियन

जानिए राज काज में क्या है खास

Monday, May 27, 2019 11:10 AM

रास नहीं आया पगफेरा
हाथ वाली पार्टी में वेटिंग इन पी.एम. और पार्टी के युवराज का पगफेरा इस बार भी रास नहीं आया। जहां-जहां उनके पैर पड़े, वहां-वहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। वेटिंग इन पी.एम. ने जयपुर, भरतपुर, करौली और दौसा में पैर रखा तो नया गढ़ की ढह गया। और तो और अब पार्टी की सबसे पावरफुल लीडर माने जाने वाली प्रियंका मैडम ने भी जहां-जहां का दौरा किया तो वहां भी सूपड़ा साफ हो गया। सालों से गांधी टोपी लगाए घूमने वाले भाई लोगों के आज तक समझ में नहीं आया कि इस दुर्गति का ठीकरा किसके सिर फोड़ा जाए। चारों खाने चित्त पड़े हाथ वाले भाई लोग अब कोई ऐसा नया टोटका ढूंढने में जुटे हैं, जिससे आगे होने वाले बंटाधार पर लगाम लगे।

कमाल चौड़ी टीकी का
भगवा वाली मैडम इस बार खुद भी हतप्रभ हैं। हो भी क्यों ना, उनको समझ में नहीं आ रहा है कि उनकी देवी मां के दरबार की चौड़ी टीकी ने तो इस बार पिटारे में से 22-23 सीटों को निकालने की बात कही थी। लेकिन वह तो लगातार दूसरी बार भी  पूरे 25 के आंकडे पर जा चढ़ीं। मैडम की टीकी के इस करिश्मे से हाथ वाले नेता भी भौचक्के हैं। वो खुद भी नहीं समझ पा रहे हैं कि यह कैसे हो गया। राज का काज करने वालों ने टीकी में छिपे राज को समझ लिया। हाथ वालों ने मूंछों पर ताव देकर चेतावनी दी थी कि दम हो तो हमारी जितनी कामयाबी हासिल करके दिखाएं। टीकी के कमाल से जोधपुर वाले भाई साहब और छोटे पायलट के सामने गम भुलाने के सिवाय कोई चारा नहीं है।

दंभ का नतीजा
इंदिरा गांधी भवन में बने पीसीसी के ठिकाने पर पिछले चार दिनों से हाथ वाली पार्टी में मंथन हो रहा है कि आखिर यह कैसे हुआ। असली राज तो सभी जानते हं, लेकिन मुंह नहीं खोल रहे। जिस दिन मुंह खुलेगा, उस दिन जग जाहिर होगा कि इस हालत के लिए कौन जिम्मेदार हैं। हाथ वालों को लंगड़ी लगाने वालों का तर्क है कि दंभ भरने वालों का हस्र ऐसा ही होता है। सूबे के चुनावों में 99 का आंकड़ा आने से थोड़ी बहुत इज्जत बनी रह गई थी, लेकिन इस बार तो रही-सही भी पूरी हो गई। दिन रात हाथ से हाथ मिलाकर चलने वालों ने ही  एक-दूसरे को निपटाने में कसर जो नहीं छोड़ी।

अब जरूरत फ्रंट में लाने की
दिल्ली दरबार के लिए हुए चुनावों में आकाश-पाताल का फर्क से राज का काज करने वालों में एक नई बहस छिड़ गई है। बहस में छोटे-मोटे मुद्दे पर नहीं बल्कि नमो के नवरत्नों में शामिल होने को लेकर है। वाराणसी और अयोध्या धाम वाले पड़ौसी सूबे में हुए बड़े बदलाव ने कई तरह के संकेत दिए हैं। दलित वोटों ने तिलक-तराजू और तलवार वालों के साथ कमल की खुशबू सूंघ कर शून्य की लक्ष्मण रेखा ऐसी खींची कि माया का हाथी बाहर निकलने के लिए सूंड मारता ही रहा। दलितों वोटों के टर्न आउट ने इस बार भी 64 सीटें देकर मैसेज दे दिया है कि अगर उनको जोड़ कर रखना है, तो उनके नेताओं को फ्रन्ट लाइन में लाना जरूरी है। चर्चा है कि इस टर्न आउट से बीकानेर वाले भाई साहब के भी मन में फिर से लड्डू फूटने लगे हैं।
एक जुमला यह भी
चुनावी नतीजों के दिन हाथ वाली पार्टी के दफ्तर के एक कमरे में दरी-पट्टियां उठाने वाले कार्यकर्ता के साथ एक नेताजी भी हार के कारणों की समीक्षा में उलझे हुए थे। नेताजी ने नमकीन का फांका मुंह में डालते हुए कहा कि पार्टी की यह हालत करने वाले कितने बेशर्म हैं कि नैतिकता के आधार पर त्याग-पत्र देने के लिए झूठे मन से भी नहीं बोल रहे हैंं। सामने वाले ने कहा कि इसके लिए आप भी जिम्मेदार है। गुजरे जमाने में लालबत्ती का मजा लेने के बाद मैदान से ऐसे गायब हो गए जैसे गंजे के सिर से बाल। अगर आप मन से जुटते तो पांच महीने पहले ही बनाए नए गढ़ को कोई नहीं ढहा सकता था।
- एल.एल.शर्मा