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Thursday 19th of September 2019
ओपिनियन

चक्रव्यूह रचने में माहिर अमित शाह

Wednesday, May 29, 2019 10:15 AM
अमित शाह (फाइल फोटो)

तमाम अंतर्विरोधों और विरोधाभासों के बावजूद भाजपा लगातार दूसरी बार अपने ही बूते पर सरकार बनाने में सफल हुई है, इसके पीछे नरेन्द्र मोदी की करिश्माई शख्सियत की तो सबसे बड़ी भूमिका रही ही लेकिन साथ ही इसमें भाजपा के चाणक्य माने जाने वाले अमित शाह की महत्वपूर्ण भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अगर देशभर में पांच वर्षों के अंतराल बाद भी बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई, विकास जैसे तमाम मुद्दों की मौजूदगी के बावजूद मोदी का जादू मतदाताओं पर सिर चढ़कर बोलता रहा तो उसकी एक अहम वजह यह भी रही कि इसके लिए चुनावी गणित के महारथी अमित शाह पिछले पांच साल से लगातार रणनीतियां बनाते रहे और वक्त के साथ-साथ जरूरत के मुताबिक उनमें अपेक्षित बदलाव कर ऐसे राज्यों को भी भाजपा के साथ जोड़ने की कवायद में जुटे रहे, जहां भाजपा का कोई जनाधार ही नहीं था।

अगर ऐसे राज्यों में भी भाजपा अपना जलवा दिखाने में सफल रही है तो इसका श्रेय शाह की चाणक्य नीतियों को ही दिया जाएगा। सियासी चक्रव्यूह रचने में माहिर अमित शाह ने भाजपा को ऐसी प्रचण्ड जीत दिलाकर यह साबित भी कर दिया है कि उन्हें यूं ही भाजपा का चाणक्य नहीं कहा जाता। दरअसल वह अवसर के मुताबिक अपनी चाल चलकर विरोधियों को पटखनी देने के लिए जाने जाते हैं। उनकी रणनीतियों और अथक परिश्रम का ही नतीजा है कि आज देश का राजनीतिक मानचित्र पूरी तरह बदल चुका है।

अमित शाह को इस बात का भली-भांति अनुमान था कि पार्टी के लिए अपनी पिछली बार की 282 सीटों को बचाए रख पाना इतना आसान नहीं होगा। इसलिए उन्होंने अपनी रणनीतियों में व्यापक बदलाव करते हुए भाजपा के साथ नए राज्यों को जोड़ने का अभूतपूर्व निर्णय लिया और उन राज्यों को अपना कार्य क्षेत्र बनाया, जहां पार्टी 2014 में बहुत कमजोर थी। उनकी रणनीति यही थी कि पार्टी अगर अपनी पिछली जीती कुछ सीटों पर पिछड़ भी जाती है तो ये नए राज्य उसके लिए संजीवनी की भूमिका निभा सकें। 2019 के चुनाव में हुआ भी बिल्कुल ऐसा ही।

असम और त्रिपुरा में भाजपा की सरकार बनाने के बाद पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा को अपना कर्म क्षेत्र बनाने की शाह की रणनीति ने पार्टी को ऐसी ताकत प्रदान की कि वह अपने ही दम पर 300 का आंकड़ा छूने में सफल हो गई। कड़े फैसले लेने के लिए जाने जाते रहे अमित शाह ने दिल्ली नगर निगम के चुनावों में कई निवर्तमान पार्षदों की टिकट काटने का प्रयोग किया था, जो बेहद सफल रहा था। इसी प्रयोग को उन्होंने लोकसभा चुनाव में आजमाते हुए कई मौजूदा सांसदों की टिकटें काटी और कइयों की सीटें बदल दी। उनका यह प्रयोग लोकसभा चुनाव में भी गहरा असर दिखा गया।

पांच साल तक सत्ता चलाने के बाद पुन: भाजपा की सम्मानजनक तरीके से सत्ता वापसी के लिए अमित शाह ने कितनी मेहनत की, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में भाजपा को जीत दिलाने के लिए उन्होंने न केवल 312 लोकसभा क्षेत्रों का दौरा करने के साथ-साथ 162 रैलियां और 18 रोड शो किए बल्कि करीब 1.58 लाख किलोमीटर यात्राएं भी कीं। अगर भारतीय राजनीति के इतिहास में झांककर देखें तो संभवत: किसी भी दूसरी राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष का अब तक हुए किसी भी लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसा रिकॉर्ड देखने को नहीं मिलेगा।

मार्च 2017 तक की उनकी यात्राओं के आंकड़े पर नजर डालें तो उन्होंने प्रतिदिन औसतन 524 किलोमीटर का सफर किया और 32 माह में 5 लाख 7 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी यात्राएं की। भाजपा के शासन के पांच वर्षों में उन्होंने न केवल उन राज्यों की यात्राएं की, जहां भाजपा की सरकारें हैं बल्कि उन राज्यों पर उससे भी ज्यादा ध्यान केन्द्रित किया, जहां भाजपा पिछले चुनावों में काफी पिछड़ी हुई थी। आंध्र प्रदेश, केरल, उड़ीसा, तमिलनाडु, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल जैसे पारम्परिक रूप से कमजोर इन राज्यों में भी भगवा फहराये जाने के मंसूबों के साथ उन्होंने अनेक यात्राएं की और पार्टी का जमीनी ढ़ांचा मजबूत करने के लिए निरन्तर प्रयासरत रहे।

अपनी इन यात्राओं में वे संगठन को चुनौतियों से उबारने का मंत्र बताने के साथ-साथ संगठन तथा राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा सरकारों के बीच व्याप्त आपसी नाराजगी को दूर करने का भी प्रयास करते रहे। मुम्बई में जन्मे मूल रूप से गुजराती अमित शाह अहमदाबाद में आरएसएस सदस्य बनने के बाद भाजपा के छात्र संगठन एबीवीपी के लिए काम करते रहे और 1984-85 में भाजपा में शामिल हुए। कुछ समय बाद वे भारतीय जनता युवा मोर्चा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और फिर गुजरात भाजपा के उपाध्यक्ष बनाए गए। गुजरात में जब मोदी युग की शुरूआत हुई, तब वे गुजरात के गृहमंत्री बने और तभी से मोदी और शाह की जोड़ी राजनीति में एक साथ निरन्तर सक्रिय है और लगातार कमाल करती रही है।

अमित शाह के बारे में कहा जाता है कि उन्हें जिस भी किले में सेंध लगानी होती है, पहले उसकी पूरी केस स्टडी करते हैं और फिर अपनी चाणक्य नीतियों से या तो अपने विरोधियों को हाशिये पर लाकर खड़ा कर देते हैं या अपने पक्ष में कर लेते हैं। शाह के पास भाजपा के बूथ लेवल तक के हर कार्यकर्ता का पूरा डाटाबेस है और उनमें ऐसी गजब की संगठन क्षमता है कि वो जब चाहें, किसी भी बूथ के कार्यकर्ता से सीधे सम्पर्क कर सकते हैं।
-योगेश कुमार गोयल