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Thursday 20th of June 2019
ओपिनियन

जनादेश को करो प्रणाम!

Thursday, May 30, 2019 09:50 AM

भारत में लोकतंत्र के गर्भ से 17वीं लोकसभा का जन्म हो चुका है और उसके पहले ही विजय संदेश में सबका साथ, सबका विकास के आगे अब सबका विश्वास भी जुड़ चुका है। लगता है पांच साल बाद जिस विश्वास की जनता के दिलों में कमी थी, उसकी भरपाई आगे ब्याज सहित नई सरकार करेगी। लगता है अब अच्छे दिन जरूर आएंगे, क्योंकि धर्म की सेनाओं ने जातियों की सेनाओं को परास्त कर दिया है। लोकतंत्र की ये महाभारत 1952 से चलकर 2019 तक जारी थी, जारी है और आगे भी जारी रहेगी। फर्क ये आया है कि इस बार 353 सांसदों की प्रचण्ड विजय के महानायक ने भारत के संविधान की ढोक लगाई है जबकि 2014 में अच्छे दिनों के इस प्रणेता ने, संसद की सीढ़ियों पर अपना माथा टेका था।

भारत के लोकतंत्र की इस अतुलनीय ताकत को देख-सुनकर देश के 134 करोड़ देवी-देवताओं के लोक परलोक में रहने वाले 90 करोड़ मतदाताओं में से 61 करोड़ 30 लाख मतदाताओं ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ये जनादेश दिया है कि फिर एक बार, मोदी सरकार। इसलिए चुनाव का ये उत्सव, आज फिर एक बार ये शपथ लेगा कि नया भारत अब नए सपनों के साथ 21वीं शताब्दी की चुनौतियों पर खरा उतरेगा। आशा और उम्मीदों की इस रथ यात्रा में मुझे पहली बार पुरुषों से अधिक 29 करोड़ 24 लाख महिलाओं की भागीदारी ने भी ये भरोसा दिलाया है कि अब भारत बदल रहा है, क्योंकि भारत में गरीब और अमीर की दो जातियों का होना ही हमारे प्रथम सेवक, प्रधानमंत्री ने स्वीकार कर लिया है।

हम लोकतंत्र और स्वतंत्र भारत की इस महागाथा को पिछले 72 साल से पढ़ रहे हैं और सुन रहे हैं कि आज नहीं तो कल, हम भारत के लोग सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक क्षेत्र की गैर बराबरी से मुक्त होंगे और विविधता में एकता को ही अपने विकास तथा विश्वास का मुख्य आधार बनाएंगे। क्योंकि भारत की पांच हजार साल पुरानी संस्कृति और सभ्यता की आत्मा तब से अब तक वसुधैव कुटुम्बकम का अनहदनाद ही जगा रही है।

समय, समाज और हमारा अनुभव इसीलिए कहता आया है कि जीवन में जीत और हार, सच और झूठ, धर्म और अधर्म तथा धूप-छांव का खेल अनवरत चलता रहता है। इस माया लोक में कोई और कुछ भी, स्थाई और अजेय नहीं है इसलिए अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ते रहो, क्योंकि प्रकृति का नियम है कि सूरज भी पूरब से उठकर पश्चिम में डूबता है और दक्षिणी से उत्तर में जाकर ही समय को पवित्र और शुभ मंगल बनाता है। चुनाव, सरकार, शक्ति, यश, कीर्ति, धन, लालसा और काम, क्रोध, मद, लोभ का ये सांसारिक चक्रव्यूह लगातार बनता और बिगड़ता रहता है।

कभी सोचिए कि सीता को वनवास  क्यों भोगना पड़ा तो बेकसूर द्रोपदी का चीर हरण होता देखकर भी भीष्म पितामह सिर झुकाकर क्यों लाचार बने रहे तो स्वतंत्र भारत के प्रवर्तक महात्मा गांधी ही आज सबसे अधिक उपेक्षित और उत्पीड़त क्यों है तो संविधान के निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर ही आज अछूत और दलित कैसे हैं तो इस देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू भी 17 साल तक भारत की खोज और विश्व इतिहास की झलक देकर अब सर्वथा क्यों भुला दिए गए हैं? ये ही लोकतंत्र में राज्य और सत्ता का असली स्वभाव है। अत: सत्ता और व्यवस्था की सूर्य पूजा अपनी जगह है तो जन-गण- मन का दु:ख सुख अपनी जगह है। क्योंकि लोकतंत्र और संविधान की भारत का भविष्य है।

हमारे परमवीर प्रधानमंत्री को पुन: जनादेश की विजय पर बधाई देते हुए आज हम ये ही कहेंगे कि कृपया सबका साथ- सबका विकास और सबका विश्वास जीतकर वो सभी संकल्प पूरे करें ताकि बहुमत को सर्व मत कहा जा सके। इस जनादेश-2019 की व्यापकता को तत्काल में इस तरह भी प्रणाम किया जाना चाहिए कि इसने राजनीति के सभी रंगों का भूत-भविष्य और वर्तमान को बदल दिया है।

आज 134 साल पुरानी कांग्र्रेस पार्टी जहां अपने अस्तित्व को बचाने में जुटी है वहां 1925 से उठी संघ परिवार की मनोकामना कोई 94 वर्ष बाद आज अपने को जनपथ से राजपथ तक कैसे ललकार रही है। इसे लोकतंत्र के सभी निमार्ताओं को गहराई और धैर्य से समझना चाहिए कि हम भारत के लोग बार-बार सरकार और विचारधारा का मुखौटा बदलकर भी गरीब, दलित, पीड़ित, शोषित और वंचित समाज व्यवस्था का चेहरा क्यों नहीं बदल पा रहे हैं? और हम कैसे केवल एक विजयश्री प्राप्त करने के लिए सम्पूर्ण लोकतंत्र को बेरोजगारी, किसानों की बदहाली, नफरत और झूठ की खुशहाली तथा कालेधन और भ्रष्टाचार जैसे महात्मा गांधी के बताए सात-सामाजिक पापों की प्रचार लीला में बदल रहे हैं।

लोकतंत्र का ये मनोविज्ञान समझने के लिए अब राजनेताओं का पुराना चश्मा और मानसिकता बदलना जरूरी है क्योंकि जनता अब हर चुनाव में भय, भाग्य और भगवान तक को चुनौती दे रही है। फिर भी हम सब भारत माता के सपूत आज वंदे मातरम गाते -गाते और स्वाधीनता संग्र्राम को सुनते-सुनाते हुए इतने अविभूत और एकजुट है कि लोकतंत्र और संविधान की इस अमर चित्र माला देकर आने वाली नई पीढ़ी को ये गर्व से आज कह पा रहे हैं कि डरो मत और सत्य की खोज जारी रखो। एकाधिकार और अधिनायकवाद आने वाले भविष्य का भारत, कभी नहीं बन सकेगा क्योंकि हम भारत के लोग मौन रहकर भी मुखर जनादेश के निर्माता हैं और अपने अधिकार तथा कर्तव्यों के प्रति सजग हैं।
- वेदव्यास