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Thursday 19th of September 2019
ओपिनियन

आधे सांसदों पर आपराधिक मामले

Friday, May 31, 2019 10:15 AM

संसद के सेंट्रल हॉल में आयोजित उस कार्यक्रम में भाजपा समेत एनडीए के निर्वाचित सांसद प्रधानमंत्री मोदी के अभिनंदन के लिए एकत्र हुए थे। प्रधानमंत्री ने अपने प्रभावशाली भाषण में न्यू इंडिया के निर्माण के लिए नव-निर्वाचित सांसदों का आह्वान करते हुए सार्वजनिक जीवन में शुचिता के महत्व को रेखांकित किया था। समारोह के अंत में सांसद एक-एक कर प्रधानमंत्री को बधाई दे रहे थे। प्रधानमंत्री बड़े उत्साह के साथ सभी का अभिनंदन स्वीकार कर रहे थे। तभी भोपाल से भाजपा के टिकट पर निर्वाचित सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर प्रधानमंत्री के समक्ष पहुंची। प्रधानमंत्री ने उन्हें देखकर मुंह फेर लिया। यह उन्हें इशारा था आगे बढ़ने के लिए।

बिना बधाई दिए उन्हें आगे बढ़ना पड़ा। साध्वी प्रज्ञा का अभिनंदन न स्वीकार कर प्रधानमंत्री ने अपनी उस प्रतिक्रिया को ही रेखांकित किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि राष्टÑपिता महात्मा गांधी और उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे के बारे में साध्वी प्रज्ञा ने जो कहा है, उसके लिए वे साध्वी को मन से कभी क्षमा नहीं कर पाएंगे। ज्ञातव्य है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह ने गोडसे को देशभक्त बताया था और कहा था कि गोडसे देशभक्त थे, देशभक्त हैं, और देशभक्त रहेंगे। उनके इस वक्तव्य पर देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी और भाजपा-नेतृत्व के निर्देश पर साध्वी प्रज्ञा सिंह को क्षमा मांगनी पड़ी थी।

ज्ञातव्य यह भी है कि साध्वी प्रज्ञा सिंह और कुछ अन्यों के खिलाफ  सन 2008 में हुए माले गांव बम धमाके का आरोप है और फिलहाल वे स्वास्थ्य- कारणों से जमानत पर हैं। इस बम-कांड में छह लोगों की मृत्यु हो गई थी और आरोपियों को हत्या का जिम्मेदार बताया जा रहा है। अर्थात आज की तारीख में साध्वी प्रज्ञा सिंह हत्या की आरोपी हैं। निश्चित रूप से उन्होंने यह तथ्य चुनाव आयोग के समक्ष दिए गए हलफनामे में रखा होगा। कानून की भाषा में इसे आपराधिक पृष्ठभूमि होना माना जाता है। हां, यह सही है कि व्यक्ति अपराधी तभी होता है जब अदालत ऐसा घोषित कर दे। तब तक व्यक्ति सिर्फ  आरोपी होता है। पर सवाल उठता है कोई साध्वी प्रज्ञा हमारी राजनीति की जरूरत क्यों बने?

और यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हमारी नई लोकसभा में 539 विजेताओं में से 233 सांसदों ने स्वयं घोषणा की है कि उनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। सन 2009 की लोकसभा की तुलना में यह आंकड़ा 44 प्रतिशत अधिक है। सन 2014 के चुनावों में 542 में 185 अर्थात 34 प्रतिशत विजयी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज थे। इसका अर्थ यह हुआ कि पिछले दो सदनों की तुलना में हमारी संसद के वर्तमान सदस्यों में आपराधिक रिकार्ड वाले सांसद अधिक हैं।

विजयी सांसदों में से लगभग आधे सांसदों ने चुनाव आयोग के समक्ष अपने पर लगे आरोपों की पुष्टि की है। अब हमारी इस नई लोकसभा में लगभग आधे सांसद ऐसे होंगे जिन पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। हो सकता है कि इनमें से अधिकांश मामले राजनीतिक कारणों वाले होगे, पर यह भी सही है कि सांसदों पर हत्या, हत्या की कोशिश, बलात्कार, जैसे गंभीर आरोप भी लगे हैं!

संसद में, और संसद के बाहर भी, जन-प्रतिनिधियों के कथित अपराधों की चर्चा अक्सर होती रही है। उच्चतम न्यायालय ने भी संसद से यह आग्रह किया है कि कोई कानून ऐसा बनाया जाए ताकि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग हमारी राजनीति को दूषित न कर सकें। न्यायालय के ही निर्देश पर उम्मीदवारों के लिए उनके खिलाफ  चल रहे आपराधिक मामलों की जनता को जानकारी देना जरूरी बनाया गया है और न्यायालय ने ही ऐसी व्यवस्था का निर्देश दिया था कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ  चल रहे मामलों पर त्वरित निर्णय हो सके। इस संदर्भ में कुछ विशेष अदालतें बनीं भी, पर बात बनी नहीं। दुर्भाग्य से हमारे यहां न्याय की रफ्तार बहुत धीमी है और अपराध की चाल बहुत तेज है।

लेकिन सवाल सिर्फ  त्वरित निर्णय का ही नहीं है, सवाल यह है कि हमारी राजनीति आपराधिक बैसाखियों के बिना क्यों नहीं चल सकती? आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोग हमारे राजनीतिक दलों की विवशता क्यों बन जाते हैं? और क्यों मतदाता को उम्मीदवारों की आपराधिक पृष्ठभूमि को नजरंदाज करना पड़ता है? ऐसा नहीं है कि दुनिया के बाकी देशों की राजनीति आपराधिक तत्वों के हस्तक्षेप से पूर्णतया मुक्त है। पर हमारी स्थिति, दुर्भाग्य से, बद से बदतर होती जा रही है। सन 2009 की तुलना में 2019 में संसद में आपराधिक मामलों के आरोपियों की संख्या का लगभग दुगना हो जाना एक चिंतनीय स्थिति ही नहीं, एक गंभीर संकट भी है.. यह संकट हमारे जनतंत्र का है।

जनतंत्र में हमारे प्रतिनिधि हमारा शासन चलाते हैं। क्यों हम बाध्य हों ऐसे प्रतिनिधियों को चुनने के लिए जो हमारा आदर्श नहीं बन सकते? आखिर कोई रास्ता तो निकालना ही होगा राजनीति के गंदे नाले को साफ  करने का। यह सफाई तभी सार्थक हो सकती है जब गंदगी बढ़ने की स्थितियां समाप्त हों। सफाई करने और गंदगी न होने देने के अंतर को समझना होगा हमें। समझना होगा कि राजनीति की गंगा भी तभी स्वच्छ होगी जब हमारी घटिया राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के गंदे नाले उसकी नियति नहीं रहेंगे। येन-केन प्रकारेण सत्ता पाने की भूख ही गलत नीतियों-रीतियों को अपनाने का कारण बनती है। हर कीमत पर जीत की लालसा का ही परिणाम है कि हमारी राजनीति के कर्णधारों को अपराध अपराध नहीं लगते, अपराधी में उम्मीद दिखती है।

- विश्वनाथ सचदेव