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ओपिनियन

फिर शान की सवारी साइकिल हमारी

Monday, June 03, 2019 10:15 AM

कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है। एक जमाना था जब खासकर भारत ही नहीं लगभग दुनियाभर में साइकिल का बोलबाला था। क्या अब उसी साइकिल युग के लौटने की परिस्थितियां बन रही हैं। यह गंभीर विचारणीय प्रश्न है। आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लंदन में अब डॉक्टर अपने मरीजों को पर्ची पर दवाइयों के साथ रोज 30 मिनट साइकिल चलाने की सलाह भी दे रहे हैं। दरअसल, डॉक्टरों का मानना है कि ऐसा करके वे अपने मरीजों को दवाओं के साइड इफेक्ट से बचाने के साथ ही उनके दवाओं के खर्च में कटौती भी कर रहे हैं। पहले अधिकांश डॉक्टर साइकिल चलाने का सिर्फ जबानी परामर्श देते थे लिखकर देने का चलन तो अब शुरू हुआ है।

संयुक्त राष्ट द्वारा आज तीन जून को विश्व साइकिल दिवस घोषित किया गया था। साइकिल की खोज के बारे में कुछ इतिहासविद् कहते हैं कि 763 में पहली साइकिल बनी थी वहीं कुछ का कहना है 1839 में स्कॉटलैंड के एक लुहार विर्कपैट्रिक मैकमिलन को विश्व की पहली साइकिल बनाने का श्रेय दिया जाता है। कहा तो यह भी जाता है कि साइकिल का प्रचलन 19वीं शताब्दी में यूरोप में हुआ।  खैर..... जब कई शहरों में साइकिल की मांग बढ़ी तो इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका के यंग निर्माताओं ने इसमें कई सुधार किए तथा 1872 में इसे एक सुंदर रूप  दे दिया और फिर साइकिल शान की सवारी माना जाने लगा।

चीन के बाद दुनिया में आज भी सबसे ज्यादा साइकिल भारत में बनती है। 1960 से लेकर 1990 तक भारत में ज्यादातर परिवारों के पास साइकिलें थीं। कहा जाता है कि दुनिया में सबसे ज्यादा साइकिलें चायना की सड़कों पर चलती हैं। यहां के हर एक घर में एक साइकिल होती है। पूरी दुनिया की बात करें तो हर साल 10 करोड़ साइकिलें बनाई तथा बेची जाती हैं। चिंता की बात यह भी है कि दुनिया की आबादी के हिसाब से साइकिलों की संख्या कम हो रही है। भले साइकिलों की संख्या कम हो रही है पर जब डॉक्टर्स भी कह रहे हैं कि साइकिल इंसान के दिल-दिमाग और शरीर को पूरी तरह से स्वस्थ रखती है तो ऐसे में पूरी दुनिया का ध्यान अब साइकिल पर ज्यादा जा रहा है।

दुनियाभर की सरकारें और पर्यावरण की चिंता करने वाले लोग शहरी पर्यावरण की सुरक्षा के लिए साइकिल सवारी को बढ़ावा देने में जुटे हैं। फ्रांस की राजधानी पेरिस को 2020 तक दुनियाभर की साइकिलिंग राजधानी बनाने के लिए 1.5 करोड़ यूरो की योजना बनाई गई है। साइकिल के बढ़ते क्रेज के मद्देनजर हर साल साइकिल के नए-नए मॉडल भी बाजार में आ रहे हैं। इनमें लकड़ी और बैंबू की साइकिल, पैडल के साथ बैटरी से भी चलने वाली साइकिल और फोल्ड होकर एक टोकरी में रखने वाली साइकिल भी शामिल है। हैैरत की बात यह भी है कि इनमें से कुछ साइकिलों की कीमत तो कार से भी ज्यादा है।

नीदरलैंड साइकिल को बढ़ावा देने में कई यूरोपीय देशों से आगे हैं। इंस्टीट्यूट आॅफ  ट्रांसपोर्ट पॉलिसी एनालिसिस की रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में करीब 37 फीसदी लोग छुट्टी के दिनों में साइकिल इस्तेमाल करते थे। जबकि काम पर जाने के लिए सिर्फ 25 फीसदी लोग साइकिल का इस्तेमाल कर रहे थे। ऐसे में नीदरलैंड सरकार साइकिल का इस्तेमाल करने वाले लोगों को टैक्स में छूट भी दे रही है। यहां तक कि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री भी चर्चा के विषय बने हुए हैं क्योंकि वो साइकिल से ही संसद जाते हैं। इस देश में रोड एक्सीडेंट ना के बराबर तथा यह अनोखा इसलिए भी कि यहां देश की आबादी से ज्यादा साइकिलें मौजूद हैं।

बढ़ते प्रदूषण के चलते भारत सहित कई देश इलेक्ट्रिक साइकिलें भी बना रहे हैं। हाल ही में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में देश-दुनिया की साइकिल कपंनियों को एक मंच पर जमा किया। इस एक्सपों में देश-विदेश की करीब 170 कंपनियों ने हिस्सा लिया। द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टेरी) के एक अध्ययन पर गौर किया जाए तो छोटी दूरी के सफर के लिए अगर दुपहिया या चार पहिया वाहनों के बजाए साइकिल का इस्तेमाल  किया जाए तो इसमें देश की अर्थव्यवस्था को 1.8 खरब रूपए का लाभ होगा। हालांकि उत्तर-प्रदेश सहित कई राज्यों में साइकिल के लिए अलग लेन बनाने की पहल चल रही है। कई राज्य सरकारें साइकलिंग को प्रोत्साहित करने के लिए जागरूकता अभियान चला रही है। दिल्ली जैसे शहरों में किराए की साइकिल की सुविधा भी उपलब्ध की गई है।

जो भी हो पर्यावरण के लिए अति लाभदायक और इसमें कार्बन उत्सर्जन शून्य के बराबर होने के कारण इस शान की सवारी की वापसी सुकुन देने वाली है। एक रोचक बात यह है कि दुनिया की सबसे महंगी साइकिल लंदन ने तैयार की है। 24 कैरेट गोल्ड की इस साइलिक की कीमत 4 करोड़ 20 लाख रखी गई है पर यह सिर्फ प्रदर्शन के काम आएगी।

 - नवीन जैन