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Thursday 20th of June 2019
ओपिनियन

अपने ही गढ़ में बेगाने हो गए नेता

Wednesday, June 05, 2019 14:55 PM
राहुल गांधी, ज्योतिरादित्य सिंधिंया व मानवेन्द्र सिंह (फाइल फोटो)

@डॉ.धर्मवीर चन्देल

भारतीय राजनीति में वंशवाद तेजी से परवान चढ़ा है। कहा जाता है कि पं.नेहरू जब देश के प्रधानमंत्री थे, तब उनके जीवनकाल में ही 1959 में इंदिरा गांधी को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया गया था, उसके बाद अन्य नेताओं ने भी देखा-देखी अपने बाल-गोपालों को सियासत के गलियारों में भेजना शुरू कर दिया। वंशवादी राजनीति ने सियासत के गलियारों में ऐसा रंग जमाया कि हर कोई वंशवादी राजनीति के रंग में रंगा नजर आया।

वक्त के साथ वंशवादी राजनीति का रंग अधिक गहरा होता चला गया। इससे परिवार की राजनीति तो फल-फूलती रही, लेकिन इस पद्धति से उन लोगों को निराशा हाथ लगती, जो सियासत के माध्यम से समाज को बदलने का सपना देखा करते थे। नए लोगों को वंशवादी सियासत के चलते मौका ही नहीं मिल पाता था। वंशवादी राजनीति की खास बात यह रही कि कोई भी दल अब इससे अछूता नहीं रहा। 17वीं लोकसभा के चुनाव परिणाम ने एकबारगी कुछ संख्या में वंशवादी राजनीति के किले ढहाने का कार्य किया हैं।

एकबारगी सरसरी निगाहों से देखे तो कांग्रेस परिवार के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी हो या  चौधरी चरणसिंह के कुनबे के अजित सिंह या फिर हरियाणा के चौधरी देवीलाल या भजनलाल का परिवार ही क्यों न हो, सभी ने इस चुनाव में शिकस्त का स्वाद चखा है। राजस्थान के मतदाताओं ने भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत, नागौर के नाथूराम मिर्धा की पौत्री ज्योति मिर्धा, मेजर जसवंत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह को मतदाताओं ने नकार दिया। यदि यह कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अपने ही गढ़ में विराने हो गए नेता।


राहुल गांधी

अमेठी की जनता ने राहुल गांधी को इस बार करीब 55 हजार मतों से चुनाव हरा दिया। अमेठी गांधी परिवार की परम्परागत सीट रही है, जहां से पहले संजय गांधी और उनके निधन के बाद राजीव गांधी ने भाग्य आजमाया और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे अमेठी से ही सांसद बनकर देश के प्रधानमंत्री बने थे। हालांकि, आपातकाल के बाद वर्ष 1977 में हुए लोकस•ाा चुनाव में अमेठी की जनता ने संजय गांधी को भी खारिज कर दिया था। हालांकि, राहुल गांधी को पूर्व में ही अमेठी की जनता के मिजाज का अहसास हो गया था, इस कारण उन्होंने अमेठी के साथ ही केरल के वायनाड से चुनाव लड़ा और अच्छे मतों से जीतकर लोकसभा पहुंचे, जबकि अमेठी में उन्हें हार का सामना करना पड़ा।


अजीत सिंह
भारतीय राजनीति में किसान राजनीति के जन्मदाता और देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी चरणसिंह के पुत्र चौधरी अजीत सिंंह और पौत्र जयन्त सिंह भी चुनाव में अपनी परम्परागत सीट नहीं बचा पाए। एक दौर ऐसा था, जब पश्चिमी उत्तरप्रदेश में चौधरी चरण सिंह का डंका बजता था, उनके नाम पर कई बार उनके पुत्र अजीत सिंह चुनाव जीतते रहे, लेकिन इस बार उन्हें चुनाव में मुंह की खानी पड़ी। चौधरी अजीत सिंह मुज्जफरनगर और जयंत सिंह बागपत से चुनाव में खेत रहे। राष्ट्रीय लोकदल का एक भी सांसद लोकसभा नहीं पहुंचा।


मीरा कुमार
देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम की पुत्री एवं पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को भी सासाराम की जनता ने लोकसभा में नहीं भेजा। सासाराम सीट से जगजीवन चुनाव जीतकर रक्षा, कृषि और देश के उपप्रधानमंत्री बने थे, लेकिन इस बार चुनाव में सासाराम की जनता ने उनके नाम का बटन नहीं दबाया। हालांकि, मीरा कुमार ने उनके पिता के निधन पर कई चुनाव सासाराम से जीते हैं, लेकिन बदलते वक्त ने कुमार को निराश ही किया है।


चौधरी देवीलाल
हरियाणा की राजनीति कई दशकों तक तीन ‘लालों’ के पीछे घुमती रही है। इसमें देवीलाल, भजनलाल और बंशीलाल शामिल हैं। इस बार के चुनाव में हरियाणा की जनता ने देश के उपप्रधानमंत्री रहे चौधरी देवीलाल के परिवार के अर्जुन चौटाला, दुष्यंत चौटाला और दिग्विजय चौटाला को बड़े अंतर से चुनाव हरवा दिया। देवीलाल के पुत्र ओमप्रकाश चौटाला कई बार हरियाणा के मुख्यमंत्री रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस की राजनीति के जोड़तोड़ में माहिर माने जाने वाले भजनलाल के पौत्र भव्य विश्नोई भी अपनी सीट नहीं बचा पाए। हरियाणा के इतिहास में यह घटना एक बड़ी परिघटना के समान हैं।


एचडी देवगौड़ा
कर्नाटक की राजनीति के बेताज बादशाह रहे और वर्ष 1996 में देश के प्रधानमंत्री बने एचडी देवगौड़ा अपनी परम्परागत सीट तुमकुर से चुनाव हार गए। उनके पौत्र निखिल कुमारस्वामी को भी चुनाव में मात खानी पड़ी। यहां तथ्य है कि एचडी देवगौड़ा के एक पुत्र कुमारस्वामी अभी कर्नाटक के मुख्यमंत्री और उनके दूसरे पुत्र राज्य में कैबिनेट मंत्री के रूप में काम रहे हैं।


ज्योतिरादित्य सिंधिया
ज्योतिरादित्य सिंधिया भी अपनी परम्परागत सीट गुना से करीब एक लाख, 25 हजार वोटों से कृष्णपाल सिंह यादव से मात खा गए। जबकि इस सीट से उनकी दादी विजयाराजे सिंधिया, उनके पिता माधवराव सिंधिया ने भी कई बार लोकस•ाा में प्रतिनिधित्व किया है। वर्ष 2002 में माधवराव सिंधिया के आकस्मिक निधन के बाद उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजनीति में भाग्य आजमाया और वे हर बार चुनाव जीतते रहे, लेकिन इस चुनाव में जनता ने उन पर विश्वास नहीं किया। कुछ साल पहले तक भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतने वाले कृष्णपाल सिंह, सिंधिया के सहयोगी हुआ करते थे, लेकिन इस चुनाव में उन्होंने सिंधिया को अपने ही गढ़ में मात दे दी।


मुलायम सिंह यादव का परिवार
उत्तरप्रदेश के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार मुलायम सिंह यादव के कुनबे को भी इस चुनाव में कड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा। मुलायम की पुत्र वधू डिम्पल यादव कन्नोज से करीब 12 हजार मतों से सुब्रत पाठक हार गई। जबकि वर्ष 2014 में डिम्पल अपनी सीट को बचाने में कामयाब हो गई थी। यहां तथ्य है कि कन्नोज से समाजवादी पार्टी के विचारक डॉ.राममनोहर लोहिया भी सांसद रहे हैं, लेकिन बदले हुए वक्त में कन्नोज की जनता ने डिम्पल को चुनाव में खारिज कर दिया। कन्नोज को समाजवादियों की परम्परागत सीट मानी जाती है। मुलायम सिंह यादव के भाई प्रो.रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव और अभयराम यादव के पुत्र धर्मेन्द यादव भी चुनाव में मात खा गए। जबकि वर्ष 2014 में मोदी लहर में डिम्पल, अक्षय और धर्मेन्द अपनी सीटों को बचाने में कामयाब हो गए थे, लेकिन इस चुनाव में उनके परिवार का गढ़ पूरी तरह बच नहीं पाया। हालांकि, मुलायम सिंह यादव मैनपुरी से जीतने में कामयाब हो गए, लेकिन उनकी जीत का अंतर पिछले सालों की तुलना में कम हो गया। हालांकि, मायावती ने उनके लिए प्रचार भी किया था।


लालूप्रसाद यादव
लालूप्रसाद यादव की पुत्री मीसा भारती को इस बार भी पाटलीपुत्र की जनता ने नापसन्द किया। भाजपा के रामकृपाल यादव चुनाव में मोर्चा मार ले गए। उन्होंने मीसा भारती को करीब चालीस हजार मतों से चुनाव में मात दी है। गौरतलब है कि रामकृपाल यादव कुछ साल पहले तक लालू यादव के बहुत विश्वापात्र हुआ करते थे, लेकिन पाटलीपुत्र से अपनी पुत्री को चुनाव लड़ाने से नाराज यादव पाला बदलकर भाजपाई हो गए और भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ लिया।


वैभव गहलोत
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के पुत्र एवं कांग्रेस के प्रदेश महासचिव वैभव गहलोत गहलोत को जोधपुर से भाजपा के गजेन्द्र सिंह शेखावत से करारी हार का सामना करना पड़ा। यहां तथ्य है कि गहलोत ने लोकसभा में जोधपुर का पांच बार प्रतिनिधित्व किया है।


ज्योति मिर्धा
कांग्रेस के दिग्गज जाट नेता नाथूराम मिर्धा की पौत्री एवं पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा को नागौर की जनता ने इस बार भी चुनाव में जीताकर नहीं भेजा। जबकि नाथूराम मिर्धा राजस्थान की राजनीति के ऐसे सितारे थे, जिन्होंने आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में नागौर से जीत दर्ज की थी, उस समय उत्तर भारत से कांग्रेस का सफाया हो गया था। साथ ही, नाथू राम बाबा ने अपने जीवन का अन्तिम लोकसभा चुनाव भी दिल्ली के एक अस्पताल से लड़ा था, उस समय मिर्धा अस्पताल में मृत्यु शैया पर थे, लेकिन नागौर की जनता ने उन्हें चुनाव जीताकर लोकसभा भेजा था।


मानवेन्द्र सिंह
कभी भाजपा के दिग्गज रहे मेजर जसंवत सिंह के पुत्र मानवेन्द्र सिंह बाड़मेर-जैसलमेर से कांग्रेस के कैलाश चौधरी से चुनाव हार कर अपने परम्परागत गढ़ को बचा नहीं पाए।