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Thursday 20th of June 2019
ओपिनियन

कैसे मिलेगी देश को आर्सैनिक से मुक्ति

Saturday, June 08, 2019 11:10 AM

शोधकर्ताओं द्वारा आर्सैनिक प्रभावित क्षेत्रों का एक मानचित्र भी जारी किया गया है जो आर्सैनिक के संदूषण के कारण होने वाले जोखिम को दर्शाता है। रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में कुओं के व्यापक परीक्षण की आवश्यकता को इंगित करती है। ऐसा कर आर्सैनिक के लिए अत्याधिक आबादी वाले समूहों में रहने वाले लोगों के दीर्घकालिक जोखिम को कम करने में यह कदम सहायक होगा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के वैज्ञानिक आरपी सिंह ने एक शोध में इस तथ्य का खुलासा भी किया है कि आर्सैनिक एक भारी वस्तु है जो हमेशा सतह की ओर पाया जाता है। देश में पानी में आर्सैनिक की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है। दरअसल आर्सैनिक घुला भूजल स्वास्थ्य के लिए भीषण खतरा बन गया है। दावे भले ही कितने किए जाएं सच्चाई यह है कि हमारे देश में देशवासियों को पीने का साफ पानी मुहैया करा पाने में स्थानीय निकाय असमर्थ रहे हैं। नगर-महानगर निकायों द्वारा पानी की समुचित आपूर्ति आज भी एक भयावह सपने से कम नहीं है। आए-दिन पानी के लिए होने वाले संघर्ष इसके जीते-जागते सबूत हैं। इन संघर्षों में अक्सर सिर फुटौवल की घटनाएं तो आम बात हैं, कभी-कभार पानी को लेकर हत्याएं भी हो जाती हैं। इतिहास इसका प्रमाण है कि गर्मी के मौसम में जल संकट के चलते इन घटनाओं में और बढ़ोतरी हो जाती है। देश में वैसे ही पीने का साफ पानी मिलना सपने से कम नहीं है और जो मिलता भी है वह प्रदूषित है। असलियत यह है कि लोग प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं। कारण इसके अलावा उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है। सबसे बड़ी बात यह कि उनको जो पानी पीने को मिल भी रहा है, उसमें आर्सेनिक की मात्रा निर्धारित मानकों से भी कहीं ज्यादा है। नतीजतन लोग गंभीर जानलेवा बीमारियों के शिकार होकर अनचाहे मौत के मुंह में जाने को विवश हैं। समय-समय पर किए गए शोध-अध्ययन इसकी गवाही देते हैं। केन्द्रीय जल संसाधन मंत्रालय भी इसका खुलासा कर चुका है।

हालात की भयावहता का प्रमाण यह है कि आज देश की कुल आबादी में तकरीब 23.9 करोड़ से भी अधिक लोग आर्सैनिक मिला पानी पीने को मजबूर हैं। इसमें दोराय नहीं कि देश की अधिकांश आबादी पीने के पानी के लिए हैंडपंप, कुंए और नलकूपों पर ही निर्भर है। सच कहा जाए तो वह इनके सहारे ही अपने पीने के पानी की जरूरत पूरी करती हैं। लेकिन पानी में आर्सैनिक घुला होने के कारण देश की आबादी का 19 फीसदी हिस्सा या यूं कहें कि देश के तकरीब 153 से ज्यादा जिले त्वचा, त्वचा के घाव, हृदय संबंधी रोगों, फेफड़े और मूत्राशय व अन्य अंगों के कैंसर, त्वचा का फटना, केरोटोइस और नाड़ी एवं संतानोत्पत्ति से संबंधित जैसी जानलेवा बीमारी की चपेट में हैं। यही नहीं इससे बौद्धिक कार्यों की क्षमता भी प्रभावित हुई है। विडम्बना यह कि इसके बावजूद हमारी सरकार मौन साधे बैठी है। क्यों, यह समझ से परे है। देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश की स्थिति तो और भी बुरी है। हालिया अध्ययन चौंकाने वाला है। टेरी स्कूल आॅफ एडवांस स्टडीज के अध्ययन के निदेशक डा. चंदर कुमार के अनुसार यहां की 78 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है। यहां के लोग खाना, पीने के पानी, सिंचाई, व अन्य घरेलू उपयोग के लिए भूजल पर ही निर्भर हैं। शहरों की तुलना में इन इलाकों में भूजल में आर्सैनिक की मात्रा मानक से बहुत ज्यादा है। वाटर रिसर्च जर्नल में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार 1680 भूजल नमूनों के विश्लेषण-प्रयोगशाला में परीक्षण के आधार पर यह तथ्य सामने आया है कि उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल के 2.34 करोड़ लोग आर्सैनिक युक्त पानी पी रहे हैं।

इस अध्ययन में भूजल में आर्सैनिक के स्तर को प्रभावित करने वाले 20 मापदण्डों जैसे भूमि आवरण, जलभूत की गहराई, मिट्टी की रासायनिक और जैविक संरचना, जल निकासी आदि के मूल्यांकन में यह स्पष्ट हुआ है कि प्रदेश के 40 जिले आर्सैनिक की उच्च सांद्रता की चपेट में हैं। यह क्षेत्र गंगा, राप्ती और घाघरा नदियों के बाढ़ क्षेत्र में हैं। इनमें बलिया, बाराबंकी, गोरखपुर, गाजीपुर, गोंडा, फैजाबाद, लखीमपुर खीरी सर्वाधिक प्रभावित हैं। इसके अलावा आर्सैनिक के मध्यम जोखिम वाले जिलों में उन्नाव, शाहजहांपुर, चंदौली, वाराणसी, प्रतापगढ़, कुशीनगर, मउ, बलरामपुर, देवरिया और सिद्धार्थ नगर हैं। साफ है कि शहरों की तुलना में ग्रामीण इलाकों में पाइप के माध्यम से जलापूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। शोधकर्ताओं द्वारा आर्सैनिक प्रभावित क्षेत्रों का एक मानचित्र भी जारी किया गया है जो आर्सैनिक के संदूषण के कारण होने वाले जोखिम को दर्शाता है। रिपोर्ट उत्तर प्रदेश के विभिन्न इलाकों में कुओं के व्यापक परीक्षण की आवश्यकता को इंगित करती है। ऐसा कर आर्सैनिक के लिए अत्याधिक आबादी वाले समूहों में रहने वाले लोगों के दीर्घकालिक जोखिम को कम करने में यह कदम सहायक होगा। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के वैज्ञानिक आर पी सिंह ने एक शोध में इस तथ्य का खुलासा भी किया है कि आर्सैनिक एक भारी वस्तु है जो हमेशा सतह की ओर पाया जाता है। घटते भूगर्भीय जल के चलते, खेती में उपयोग में आ रहे रसायन और कारखानों से निकला रसायनयुक्त अपशेष आर्सैनिक की प्रमुख वजह है। कुछ नदियां ऐसे इलाकों और पहाड़ों से होकर गुजरती हैं जहां आर्सैनिक तत्व भारी मात्रा में होते हैं। इस बारे में एम्स के आॅन्क्रोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. एम. डी. रे की मानें तो शरीर में आर्सैनिक की मामूली मात्रा भी यदि लम्बे समय तक रह जाए तो कैंसर की संभावना कई गुणा बढ़ जाती है। क्योंकि यह मानव शरीर पर जहरीला असर डालता है। उस दशा में जबकि पानी में खतरनाक आर्सैनिक तत्व मौजूद हैं। इसे चिकित्सकीय भाषा में आर्सिनिकोसिस कहते हैं। यह शरीर में आवश्यक एंजाइंम्स पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ता है, नतीजतन शरीर के कई अंग काम करना बंद कर देते हैं और रोगी की मौत हो जाती है।                  

(ये लेखक के अपने विचार हैं)