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Saturday 20th of July 2019
ओपिनियन

नोटा के लिए विकल्प की सार्थकता

Monday, April 15, 2019 11:25 AM
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हाल में देश के सर्वोच्च न्यायालय के सम्मुख एक याचिका प्रस्तुत की गई थी कि यदि ‘नोटा’ को, जीतने वाले प्रत्याशी से अधिक मत मिलें तो उस चुनाव को निरस्त कर देना चाहिए। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका को रद्द करते हुए कहा कि हम ‘वोटिंग प्रणाली में बदलाव करके लोकतंत्र को नष्ट नहीं कर सकते। न्यायालय का यह निर्णय निश्चित ही संविधान के अनुरूप और प्रशंसनीय है, लेकिन यह कुछ दूसरे प्रति प्रश्न भी खड़े करता है।’ स्मरणीय है कि चुनाव-आयोग ने चुनावों में ‘नोटा’ का विकल्प मतदाताओं को प्रदान किया था। इसका अर्थ यह है कि अगर मतदाता को चुनाव में खड़ा कोई भी प्रत्याशी अपनी आशा के अनुरूप नहीं लगे तो वह ‘नोटा’ का विकल्प चुन सकता है।

अर्थात, ‘नोटा’ के माध्यम से वह यह कह सकता है कि उसे चुनाव में खड़ा कोई भी प्रत्याशी स्वीकार नहीं है। यह बहुत सही और तर्कपूर्ण विकल्प, चुनाव-आयोग ने हमारी चुनावी व्यवस्था को दिया। प्राय: यह देखा जाता है कि राजनीतिक दल अपना प्रत्याशी खड़ा करते समय, उसकी योग्यता, चरित्र और ईमानदारी पर ध्यान नहीं देते। वे केवल उसके जीतने की संभावना पर ध्यान देते हैं। इससे चुनाव में प्रत्याशी अपने धनबल, भुजबल या हाईकमान में अपने प्रभाव के आधार पर भी पार्टी का टिकट प्राप्त कर लेते हैं। जाति और धर्म का भी काफी प्रभाव रहता है। इससे बड़ी संख्या में दागी, भ्रष्टाचारी और बेईमान किस्म के प्रत्याशी भी चुनाव रणक्षेत्र में अपनी पैठ बना लेते हैं।

ऐसी स्थिति में उपयुक्त प्रत्याशी नहीं होने पर मतदाता को नागनाथ या सांपनाथ में से ही किसी एक को चुनना पड़ता है। अगर वह इस प्रकार गलत मतदान से परहेज करे तो उसके पास एक ही विकल्प बचता था कि वह निर्वाचन बूथ से दूर रहे तथा किसी को भी मतदान न करे। इसीलिए हमारे यहां अधिकांशत: मतदान का औसत काफी कम रहता आया है।

ऐसी परिस्थिति में ‘नोटा’ की व्यवस्था मतदाता के लिए एक प्रकार का वरदान सिद्ध होनी चाहिए थी, लेकिन व्यवहार में यह पूरी तरह साकार नहीं हो पाया। पिछले चुनावों का अनुभव यह बतलाता है कि ‘नोटा’ का विकल्प होने के बावजूद मतदाता इसका उपयोग अधिक मात्रा में नहीं कर पा रहे और स्थिति लगभग पूर्ववत् ही बनी हुई है। कारण है ‘नोटा’ की व्यवस्था का अधूरापन।

मतदाता ‘नोटा’ के परिणाम पर जब विचार करता है तो उसे यह निरर्थक लगने लगता है। वर्तमान व्यवस्था के अन्तर्गत ‘नोटा’ के पक्ष में कितने ही कम या अधिक मत डाले जाएं, उनका परिणाम शून्य ही रहता है। सर्वोच्च न्यायालय का यह तर्क सही है कि अगर ‘नोटा’ को प्राप्त मत कुल डाले गए मतों के आधे से कम हैं तो इसका अर्थ यह होगा कि अन्य प्रत्याशियों को दिए गए कुल मत आधे से अधिक हैं। तब केवल जीतने वाले प्रत्याशियों के मतों के आधार पर और कुल मतदान के बहुमत के विरूद्ध नोटा को दिए गए मतों पर निर्णय कैसे लिया जा सकता है।

यह सत्य है कि बहुमत किसी के भी साथ नहीं है। लेकिन प्राय: वह जीतने वाले प्रत्याशी के साथ भी नहीं होता। अक्सर हमारे यहां अपेक्षाकृत सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला ही विजयी माना जाता है, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार ‘नोटा’ के साथ इस परम्परा को स्वीकार नहीं किया जा सकता। आधार यही है कि मतदान का बहुमत उसके विरूद्ध है। लेकिन अधिकांश मामलों में यह तर्क तो जीतने वाले उम्मीदवार के साथ भी हो सकता है और होता भी है।

प्रश्न उठता है कि आखिर इसका समाधान क्या हो ? उचित विकल्प नहीं होने से और ‘नोटा’ की निरर्थकता के कारण मतदान नहीं करने वाले व्यक्तियों को भी गलत नहीं कहा जा सकता। मतदान नहीं करना जनतंत्र की भावना के विरुद्ध अवश्य है, लेकिन दागी, भ्रष्टाचारी और अयोग्य व्यक्ति को मतदान करने की अपेक्षा उनके तर्कसंगत विचारों के अनुसार मतदान नहीं करना भी उचित ही कहा जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में ‘नोटा’ के रूप में एक बहुत अच्छा विकल्प मतदाता के सामने आया था, लेकिन उसकी वर्तमान आधी अधूरी व्यवस्था से उसकी सार्थकता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।

निश्चित ही अदालत का यह तर्क पूरी तरह सही और उचित है कि जब विपक्ष के कुल प्रत्याशियों का मत-प्रतिशत बहुमत में है तो अल्पमत वाले नोटा के पक्ष में निर्णय कैसे लिया जा सकता है। वैसे यह बात तो उस विजेता प्रत्याशी के लिए भी सही बैठती है, जो बहुमत के स्थान पर केवल सर्वाधिक मत प्राप्त करने के आधार पर विजयी बन जाता है। इस स्थिति पर चुनाव-आयोग को गम्भीरता से चिन्तन करना चाहिए।

समस्या का समाधान केवल इस व्यवस्था से हो सकता है कि ‘नोटा’ के पक्ष में अगर स्पष्ट रूप में बहुसंख्यक मतदाता अर्थात् पचास प्रतिशत से अधिक हों तो उस स्थिति में चुनाव को निरस्त करके पुन: चुनाव करवाए जाने चाहिए और उसमें नये प्रत्याशियों को लेने के साथ ही, पूर्व चुनाव में न्यूनतम मत प्राप्त करने वाले दो या तीन मतदाताओं को प्रत्याशी बनने से प्रतिबंधित कर दिया जाए। इसके उपरान्त अपेक्षाकृत बहुमत वाले सिद्धान्त को ही अपनाया जा सकता है।

निश्चित ही इससे चुनाव आयोग का कार्यभार और व्यय काफी अधिक बढ़ जाएगा, लेकिन सही रूप में जन प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के लिए यही उपयोगी और संभव उपाय है। इसके साथ ही हमें जनता में दो बातों के प्रचार करने पर विशेष ध्यान देना होगा। प्रथम ‘नोटा’ की व्यवस्था और उसका महत्व तथा दूसरा जनतंत्र में मतदान की आवश्यकता और उपयोगिता।

हमें जनता को यह बतलाना होगा कि यह जनता का ऐसा इकलौता अधिकार है, जिसे वह स्वेच्छा से उत्तरदायित्व के साथ उपयोग में ले सकती है और सरकार के अच्छे बुरे कार्यों पर पर्याप्त नियंत्रण रख सकती है। सरकार के गलत कार्यों की आलोचना करने का भी उन्हें नैतिक अधिकार मतदान से ही प्राप्त होता है। इस सुझाव पर चुनाव-आयोग के साथ ही हमारे मतदाताओं को भी गम्भीरता से विचार करना चाहिए।

 -प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा