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Saturday 20th of July 2019
ओपिनियन

जानिए, राजकाज में क्या है खास?

Monday, April 15, 2019 11:40 AM

मदद सवाई गुणा
इन दिनों सवाई गुणा मदद को लेकर दोनों दलों में चिंतन-मंथन जोरों पर है। हो भी क्यों ना मामला मदद से ताल्लुकात रखता है और वो भी चुनावों में। हाथ वालों के साथ भगवा के ठिकाने पर चर्चा है कि पिंकसिटी की सीट से दिल्ली दरबार के लिए चुनावी जंग में कूदे भाईसाहब और बहनजी की मदद करने वालों की लिस्ट काफी लंबी है। लंबी-चौड़ी लिस्ट को देख कर उनके आकाओं के चेहरों पर भी सलवटें पड़ जाती हैं। उनको चिंता इस बात की है कि जिन भाई लोगों ने सवाई गुणा मदद के लिए ताल ठोकी है, कहीं वो उस तरह की मदद से तो मुकाबला नहीं कर रहे, जो पिछले चुनावों में उन्होंने की थी।  

सर्वे के बाद बल्ले-बल्ले
हाथ वाली पार्टी के नेता एक सर्वे के बाद कुलांचे मार रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि मरु प्रदेश में दस से बारह सीटों पर जीत के साथ पूरे देश में उनका आंकड़ा 150 के करीब बैठ रहा है। अब इनको कौन समझाए कि अपनी ही पार्टी की तरफ से कराए गए इस सर्वे पर भरोसा करना ज्यादा ठीक नहीं है। यह सर्वे तो सूबे में विधानसभा चुनावों के दौरान भी कराया था, जिसमें हाथ पार्टी को कम से कम 130 सीटों पर जीतना बताया था। खुद की अंगुलियों को कितनी ही बार गिनों, मना करने वाला कोई नहीं है।

डेमेज कंट्रोल
डेमेज कंट्रोल के कई रास्ते होते हैं, लेकिन जो रास्ता इस बार कमल वाले दल ने निकाला है, उससे राज का काज करने वाले भी चकित हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा कि सूबे के चुनावों में पानी पी-पीकर कमल वालों से ही दो-दो हाथ करने वाले हनुमानजी ने आखिर कमल वालों को क्यों पकड़ लिया। अब राज का काज करने वालों को कौन समझाए कि राजनीति में सब कुछ जायज होता है। अब देखो ना देवनारायण के वंशज कर्नल ने ढाई महीने पहले जोधपुर वाले अशोकजी को सेल्यूट कर अपना अच्छा करने की ठानी थी, लेकिन पार नहीं पड़ी तो पुराने घर में ही घुसने में अपनी भलाई समझी। आखिर डेमेज कंट्रोल के लिए हाथ से हाथ छुड़ा कर कमल की सुंगध को जो सूंघ लिया।

एक गणित यह भी
राज के कारिन्दों के पास इन दिनों कोई खास काम नहीं है। सो वे चुनावी गणित में उलझे हुए हैं। एक ने हमें बताया कि राज की जोड़-तोड़ और गुणा-भाग के बाद भी ज्यादा स्थिति ठीक नहीं। पहले किसान पुत्र, बाद में देवनारायण के अनुयायी और अब मीनेश के वंशज भी घटते नजर आ रहे हैं।

गुर राजनीति का
राजनीति बड़ी विचित्र है। इसमें ना कोई स्थाई मित्र होता है और ना ही कोई दुश्मन। अच्छा राजनेता वह होता है, जो हाथ आए अवसर का समय रहते लाभ उठा लेता है। ऐसे लोग समाज के ठेकेदार बनने से भी नहीं चूकते। राजनीति में तो हाथ को हाथ ही खा जाता है। तीन महीने पहले तक साथ जीने और मरने की कसमें खाने वाले सांगानेर वाले पंडितजी और नागौर वाले हनुमानजी ने भी किरोड़ी का साथ छोड़कर राजधर्म निभा लिया।

गुजरे जमाने में भी तीन महीने तक हाथी की सवारी करने वाले छह बसपाइयों ने भी वक्त आते ही राजधर्म को निभाया था। और तो और दो मंत्रियों ने तो वो ही किया था, जो राजनीति कहती है। बहन मायावती और भाई किरोड़ी नाराज भी नहीं हुए थे, चूंकि यह रास्ता भी तो उन्होंने ही बताया था। उनमें से कुछ भाई लोग तो विधानसभा की जंग में उतर चुके हैं।

- एल.एल शर्मा