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Sunday 21st of July 2019
ओपिनियन

पानी की कमी का गहराता संकट

Wednesday, July 03, 2019 11:10 AM

भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पानी के मुद्दे को लेकर तनातनी चलती ही रही है। इसके अलावा उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों के बीच भी पानी की वजह से झगड़े होते रहे हैं। इजराइल तथा जोर्डन और मिस्र तथा इथोपिया जैसे कुछ अन्य देशों के बीच भी पानी को लेकर काफी गर्मागर्मी देखी जाती रही है। खैर दूसरे देशों की तो बात ही छोडिए, अपने ही देश में विभिन्न राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के मामले में पिछले कुछ दशकों से बहुत गहरे मतभेद बरकरार हैं और इस वजह से राज्यों के आपसी संबंधों में काफी खटास भी उत्पन्न हो चुका है तथा वर्तमान में भी जल वितरण का मामला लगातार अधर में लटका रहने की वजह से कुछ राज्यों में जल संकट की स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। इन दिनों भीषण गर्मी और मानसून की बेरूखी के चलते हर कोई परेशान है और परेशानी की एक बड़ी वजह बहुत सारे इलाकों में गर्मी के मौसम में गहराता जल संकट है। हालात कितने विकट होते जा रहे हैं, उसका अनुमान लगाने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि महाराष्ट्र हो या राजस्थान अथवा बिहार या झारखण्ड या फिर देश की राजधानी दिल्ली, कमोवेश देशभर में जगह-जगह से पानी को लेकर लोगों के बीच आपस में मारपीट या झगड़े-फसाद की खबरें आ रही हैं। हालांकि पिछले कुछ वर्षों से केवल भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया भर के कई देशों में जल संकट गहराता जा रहा है और अगर बात भारत की करें तो खासतौर से गर्मी के मौसम में यह समस्या अब हर साल विकट रूप धारण करने लगी है। पिछले साल इसी मौसम में शिमला जैसे पर्वतीय क्षेत्र में भी पानी की कमी को लेकर जो हाहाकार मचा था, वह आंखें खोलने के लिए पर्याप्त था किन्तु फिर भी जल संकट से निपटने के लिए देशभर में कोई गंभीर प्रयास होते नहीं दिखे और यही वजह है कि भारत में बहुत सारे शहर शिमला जैसे हालातों से जूझने के कगार पर खड़े हैं।

देश में जल संकट के गहराते जाने की प्रमुख वजह है भूमिगत जल का निरन्तर घटता स्तर। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि इस समय दुनिया भर में करीब तीन बिलियन लोगों के समक्ष पानी की समस्या मुंह बाये खड़ी है और विकासशील देशों में तो यह समस्या कुछ ज्यादा ही विकराल होती जा रही है, जहां करीब 95 प्रतिशत लोग इस समस्या को झेल रहे हैं। पानी की समस्या एशिया में और खासतौर से भारत में तो बहुत गंभीर रूप धारण कर रही है। विश्वभर में पानी की कमी की समस्या कितनी तेजी से उभर रही है और यह भविष्य में कितना खतरनाक रूप धारण कर सकती है, इसका अनुमान इसी से बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है कि अब अधिकांश विशेषज्ञ आशंका जताने लगे हैं कि जिस प्रकार तेल के लिए खाड़ी युद्ध होते रहे हैं, जल संकट के बरकरार रहने अथवा और भी अधिक बढ़ते जाने की वजह से ठीक उसी तरह बल्कि उससे भी अधिक तेजी से आने वाले वर्षों में पानी के लिए विभिन्न देशों के बीच युद्ध लड़े जाएंगे और हो सकता है कि अगला विश्व युद्ध भी पानी के मुद्दे को लेकर ही लड़ा जाए। दरअसल दुनियाभर में पानी की कमी के चलते विभिन्न देशों में और भारत जैसे देश में तो विभिन्न राज्यों में ही जल संधियों पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान का भी मानना रहा है कि उन्हें इस बात का डर है कि आगामी वर्षों में पानी की कमी गंभीर संघर्ष का कारण बन सकती है।

ये आशंकाएं निराधार भी नहीं हैं क्योंकि हम इस तथ्य को नहीं नकार सकते कि पानी जीवन की अमूल्य निधि है और बिना पानी के पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसलिए अगर पृथ्वी पर जल संकट इसी कदर गहराता रहा तो इसे निश्चित मानकर चलना होगा कि पानी हासिल करने के लिए विभिन्न देश आपस में टकराने लगेंगे और दो अलग-अलग देशों के बीच नौबत युद्ध की भी आ सकती है तथा जैसी कि आशंका जताई जा रही है कि अगला विश्व युद्ध भी पानी की वजह से लड़ा जा सकता है तो अगर जल संकट बढ़ते जाने की स्थिति में वाकई ऐसा कुछ हुआ तो कोई बड़ा आश्चर्य नहीं होगा लेकिन तब इस दुनिया का क्या हाल होगा, इसकी कल्पना करते हुए भी कलेजा कांप उठता है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच पानी के मुद्दे को लेकर तनातनी चलती ही रही है। इसके अलावा उत्तरी अफ्रीका के कुछ देशों के बीच भी पानी की वजह से झगड़े होते रहे हैं। इजराइल तथा जोर्डन और मिस्र तथा इथोपिया जैसे कुछ अन्य देशों के बीच भी पानी को लेकर काफी गर्मागर्मी देखी जाती रही है। खैर, दूसरे देशों की तो बात ही छोडिए, अपने ही देश में विभिन्न राज्यों के बीच पानी के बंटवारे के मामले में पिछले कुछ दशकों से बहुत गहरे मतभेद बरकरार हैं और इस वजह से राज्यों के आपसी संबंधों में काफी खटास भी उत्पन्न हो चुका है तथा वर्तमान में भी जल वितरण का मामला लगातार अधर में लटका रहने की वजह से कुछ राज्यों में जल संकट की स्थिति काफी गंभीर बनी हुई है। पृथ्वी के कुल क्षेत्रफल के करीब दो तिहाई भाग पर पानी ही पानी है लेकिन इसमें से पानी की बहुत ही कम मात्रा मानव के लिए पेयजल, सिंचाई, उद्योगों आदि की दृष्टि से उपयोगी है। इस संबंध में ‘इंटरनेशनल एटोमिक एनर्जी एजेंसी’ का कहना है कि पृथ्वी पर उपलब्ध पानी की कुल मात्रा में से मात्र तीन प्रतिशत पानी ही स्वच्छ बचा है और उसमें से भी करीब दो प्रतिशत पानी पहाड़ों व ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा है जबकि शेष एक प्रतिशत पानी का उपयोग ही पेयजल, सिंचाई, कृषि तथा उद्योगों के लिए किया जाता है। बाकी 97 प्रतिशत पानी खारा होने अथवा अन्य कारणों की वजह से उपयोगी अथवा जीवनदायी नहीं है। पृथ्वी पर उपलब्ध पानी में से इस एक प्रतिशत पानी में से भी करीब 95 फीसदी पानी भूमिगत जल के रूप में पृथ्वी की निचली परतों में उपलब्ध है और बाकी पानी पृथ्वी पर सतही जल के रूप में तालाबों, झीलों, नदियों अथवा नहरों में तथा मिट्टी में नमी के रूप में उपलब्ध है। इससे स्पष्ट है कि पानी की हमारी अधिकांश आवश्यकताओं की पूर्ति भूमिगत जल से ही होती है लेकिन इस भूमिगत जल की मात्रा भी इतनी नहीं है कि इससे लोगों की आवश्यकताएं पूरी हो सकें।

- योगेश कुमार गोयल
(ये लेखक के अपने विचार हैं)