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Thursday 22nd of August 2019
ओपिनियन

जानें राज-काज में क्या है खास

Monday, July 22, 2019 10:30 AM

जयपुर। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले ठिकाने पर एक ऐसी कुर्सी है, जो पिछले 27 दिनों से खाली है। अब ठिकाने पर जो भी लीडर आता है, उनकी नजरें अपने आप ही कुर्सी की तरफ चली जाती है। आथूणी दिशा की ओर देख रहे ठिकाने के दाहिने कोने में बने कमरे में रखी इस कुर्सी पर कई महारथी बैठ चुके हैं। इस कुर्सी को लेकर भारती भवन में भी बैठकों में चिंतन-मंथन हुए बिना नहीं रहता।

राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में इस खाली कुर्सी को लेकर खुसरफुसर करते हैं। इस कुर्सी पर बैठने वालों की सूची में आधा दर्जन नेताओं के नाम हैं, परन्तु हम बताय देते हैं, जो नाम मार्केट में आ चुके हैं, उनका पता लगभग साफ है। कोई आश्चर्य नहीं कोटा वाले बिरलाजी की तरह किसी यूथ की तकदीर खुल जाए।

अब चर्चा में राहुल मॉडल
इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर इन दिनों राहुल मॉडल की चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी क्यों ना, सूबे में राज की कुर्सी के लिए हाथ वालों में दो-दो हाथ की नौबत आने पर उन्होंने मॉडल को दिल से तैयार किया था। सूबे में टू पावर सेन्टर बनाने वाले वेटिंग पीएम ने अपने मॉडल में  संकेत दिए थे कि अच्छी परफोरमेंस नहीं देने वाले राज के रत्नों को छह महीने में घर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। टू पावर सेन्टर का कितना असर हुआ, वो तो दिल्ली दरबार के चुनावों में पता लग ही गया। चर्चा है कि अब उस मॉडल का क्या होगा, जिसको बनाने वाले राजकुमार ने ही अपना नया रास्ता तय कर लिया। चूंकि हमारे सूबे में तो प्लान भी बड़े साहब लोगों के साथ ही चले जाने की सालों पुरानी परम्परा है।

लोकतांत्रिक बनाम राष्ट्रवाद
भारती भवन में चिंतन-मंथन करने वालों का कोई जवाब नहीं है। दाएं हाथ से जो भी काम करते हैं, उसकी बाएं हाथ तक को खबर नहीं लगने देते। अब देखो ना भाईसाहबों ने अगले महीने दो से चार तारीख तक सोशल मीडिया पर होने वाली वर्कशॉप में शरीक होने वालों से फॉर्म तो लोकतांत्रिक तरीके से भराए जा रहे हैं, लेकिन उनकी जांच-परख राष्टÑवाद की तर्ज पर की जा रही है। अब भाई लोगों को कौन समझाए कि आपके यहां तो सिर्फ वो ही आगे बढ़ते हैं, जो पूरी तरह राष्टÑवाद के रंग में रंगा होता है।

अगला बकरा कौन
सूबे में खींवसर और मंडावा में उपचुनाव तो पता नहीं कब होंगे, लेकिन राज का काज करने वालों ने अभी से ही दिमाग लगाना शुरू कर दिया। गुरु पूर्णिमा के दिन राज के सबसे बड़े ठिकाने सचिवालय में ठाले-बैठे साहब लोगों ने बहस शुरू कर दी, कि मंडावा में तो रीटा चौधरी से आस लगा सकते हैं, लेकिन हनुमान जी के मजबूत गढ़ खींवसर में बलि का बकरा कौन बनेगा। हाथ वालों की विचारधारा वाले साहब ने तो यह कह कर पल्ला झाड़ लिया कि हमने तो पहले ही सवाई ताकत लगा कर देख लिया, पर पार नहीं पड़ी। लेकिन भगवा वालों के गुणगान करने वाले साहब के सामने संकट हो गया कि वो जिसको पसंद करते हैं, उसको पार्टी ने टिकट नहीं देकर एक बार फिर समझौता कर लिया, तो बलि का बकरा बनाना तो दूर, मुंह दिखाने के लायक भी नहीं रहेंगे, चूंकि पिछले राज में नंबर दो पर रहे नेताजी का हनुमानजी से 36 का आंकड़ा जगजाहिर है।

एक जुमला यह भी
दीनदयाल उपाध्याय भवन में बने शहरी सरकार के दफ्तर में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि चार महीने बाद जाड़ों की रातों में होने वाली चुनावी जंग को लेकर है। शहरी सरकार के मेयर की कुर्सी पर बैठने को लेकर कई लोग लालायित हैं। एक भाईसाहब ने तो अभी से ही तैयारी शुरू कर दी। सो सबसे पहले उन खबरचियों की कद के अनुसार लिस्ट बनाकर मोबाइल से संपर्क साधने में ही अपनी भलाई समझी, जिनका रोजाना पगफेरा होता हैं।
(यह लेखक के अपने विचार हैं)