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Thursday 22nd of August 2019
ओपिनियन

क्या ग्राहक के अधिकार सुरक्षित हैं?

Monday, August 12, 2019 11:15 AM
फाइल फोटो।

उपभोक्ता कानून के अंतर्गत ग्राहक वह होता है जो पैसे खर्च कर कोई सामान खरीदता है या कोई सेवा लेता है। उसके साथ छल फरेब, धोखाधड़ी न हो और बेईमान दुकानदार, निर्माता या सेवा देने वाले उसका शोषण करने में कामयाब न हों और यदि ऐसा हो जाए तो कानूनी कार्यवाही से उनके हितों की रक्षा हो, इसके लिए जब उपभोक्ता संरक्षण कानून बना तो उसका व्यापक स्वागत हुआ और लोगों के मन में यह भरोसा हुआ कि अब वे बिना किसी शंका के खरीददारी कर सकते हैं।  सरकार ने इसके प्रचार प्रसार के लिए जागो ग्राहक जागो, अपने अधिकार और इसी तरह के दूसरे अभियान चलाए ताकि उपभोक्ता अपने अधिकारों को समझें और जरूरत पड़ने पर उनका इस्तेमाल करें। धीरे-धीरे लोगों में जागरूकता बढ़ी और नागरिकों ने अपने अधिकारों का हनन होने पर इस कानून के अंतर्गत स्थापित जिला उपभोक्ता फोरम, राज्य आयोग और राष्ट्रीय आयोग तक का रूख किया। उम्मीद थी कि सरकार ग्राहकों की निरंतर बढ़ती हुई संख्या के अनुसार प्रशासनिक व्यवस्था करेगी। कानून में बताई गई एक निश्चित अवधि में उसके साथ न्याय हो जाएगा और मिलावटखोरी, जमाखोरी, अधिक मूल्य वसूली जैसी व्यापारिक बुराइयों से निजात मिलेगी और ऐसा करने वालों के मन में कानून का डर होगा।

आधे अधूरे इंतजाम
केंद्रीय मंत्री श्री राम विलास पासवान ने स्वयं कुबूल किया कि सवा तीन लाख मामले जिला स्तर पर, सवा लाख राज्य स्तर पर और बीस हजार से ज्यादा राष्ट्रीय स्तर पर फैसलों का इंतजार कर रहे हैं। यह तो नहीं बताया कि कब से पेंडिंग हैं लेकिन यह माना कि सभी जिलों में उपभोक्ता अदालतें खुली नहीं हैं और एक सौ अठारह जिला अदालतों में इनके अध्यक्ष यानी न्यायाधीश नियुक्त नहीं हुए हैं और सदस्यों यानि न्यायपालिका के लिए तीन सौ बासठ पद खाली पड़े हैं। ऐसी हालत में कैसे उम्मीद की जाए कि उपभोक्ता अदालतों में जल्दी न्याय मिलने की आशा से गए पीड़ितों को न्याय मिल पाएगा।  अब जरा इस बात को परखिए कि ज्यादातर जो जिला अदालतें हैं उनकी क्या हालत है। फर्नीचर के नाम पर न्यायाधीशों के बैठने तक के लिए ठीकठाक कुर्सी मेज नहीं हैं तो फिर जो शिकायत लेकर आया है तो उसके लिए टूटी फूटी बेंच और कई जगह तो वो भी नहीं, खड़े रहकर अपना मुकदमा लड़िए, जैसी हालत के लिए क्या प्रशासन जिम्मेदार नहीं है। पानी की सुविधा नदारद और कई स्थानों पर शौचालय तक नहीं हैं।

नया कानून 2019
सबसे पहले सन 1986 में उपभोक्ता संरक्षण कानून बना था। उसके बाद इसमें कुछ संशोधन हुए लेकिन अब उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 को उसकी जगह लेने के लिए दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई है। आमतौर से सामान्य व्यक्ति को कानूनों की पेचीदगियां न तो समझ में आती हैं और वैसे भी वह उनकी तरफ  इसलिए ध्यान नहीं देता क्योंकि जरूरत पड़ने पर वकील साहब से समझ लेगा। अन्य कानूनों से अलग यह कानून इस मायने में है कि इसमें व्यक्ति अपना मुकदमा खुद लड़ सकता है और उसे वकील की सेवाएं लेने की जरूरत नहीं है। इस स्थिति में जरूरी हो जाता है कि सामान्य उपभोक्ता इन बातों को समझ ले।

नए कानून की कुछ खास बातें इस तरह हैं
पहले यह होता था कि केवल वहीं शिकायत की जा सकती थी जहां विक्रेता की दुकान या पंजीकृत कार्यालय हो लेकिन अब किसी भी जिला अदालत में शिकायत की जा सकती है। मंत्रालय इस प्रकार के नियम भी बना रहा है जिसमें एलेक्ट्रोनिकली शिकायत की जा सके और फीस भी डिजीटल तरीके से भरी जा सके। अब अगर किसी निर्माता ने उत्पाद बनाते समय नियमों का पालन नहीं किया और घटिया चीज बनाकर बेची और खरीददार को नुकसान हुआ तो उसके खिलाफ सीधे ही शिकायत की जा सकती है और हर्जाना वसूला जा सकता है। इस कानून में यह भी है कि अब कोई विक्रेता अपने ग्राहक की व्यक्तिगत जानकारी किसी और को नहीं दे सकता और इसके लिए उसे दंड मिल सकता है।  अभी तक यह होता था कि दुकानदार किसी न किसी बहाने से ग्राहक से जानकारी ले लेता था और फिर उसे दूसरों को बेच देता था और ग्राहक के पास दिनरात पता नहीं कहां से फोन आने लगते थे। अब इस पर कुछ लगाम लग सकती है।

भ्रामक विज्ञापन
अक्सर जब कोई जाना माना चेहरा विशेषकर अभिनेता या खिलाड़ी कोई चीज बेचता है तो हम यह सोचकर कि क्वॉलिटी सही होगी, लेकिन धोखा होने पर सब अपना पल्ला झाड़ लेते थे। अब उन्हें विज्ञापन में कही या दिखाई बातों की पहले स्वयं उनके सही होने की जांच करनी होगी वरना उनके लिए मुसीबत खड़ी हो सकती है। भ्रामक विज्ञापनों के लिए निर्माता को दो से पांच साल की जेल और दस से पचास लाख तक का जुर्माना हो सकता है। इसी तरह से एंडोर्स करने वाले यानी सिलेब्रिटी पर दस से पचास लाख तक का जुर्माना और एक से तीन साल तक का प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अब बिना सुनवाई के कोई शिकायत खारिज नहीं की जा सकती और अगर पंद्रह दिन तक कोई जवाब नहीं आता तो उसे स्वीकृत समझा जाएगा। अब शिकायत खारिज किए जाने की अवस्था में उसका कारण भी जानने का अधिकार उपभोक्ता को होगा, पहले की तरह किसी की मनमर्जी नहीं चल सकती। इस तरह मिलावट करने वालों और गुमराह करने वालों को कटघरे में खड़ा किया जा सकता है चाहे वह कितना भी नामचीन व्यक्ति हो या किसी भी क्षेत्र में सिलेब्रिटी हो। अब शायद इस रवैये पर लगाम लग सकेगी कि लोग अपने फेमस होने का फायदा उठाते हुए करोड़ों की आमदनी भी कर लें और उस चीज के खराब निकलने पर जिसका वह विज्ञापन कर रहे हैं, कोई उनकी तरफ ऊँगली भी न उठाए।
पूरन चन्द सरीन (ये लेखक के अपने विचार हैं)