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Thursday 19th of September 2019
ओपिनियन

आखिर क्यों गिर रहा है रुपया?

Tuesday, September 03, 2019 10:35 AM
कॉन्सेप्ट फोटो

वर्तमान समय में जो रूपये में गिरावट आ रही है इसका एक प्रमुख कारण तेल के बढ़ते आयात हैं। हमारी ऊर्जा की जरूरतें बढ़ रही हैं और तदानुसार हमें तेल के आयात अधिक करने पड़ रहे हैं। इस समस्या को और गहरा बना दिया है ईरान के विवाद ने अमेरिका ने पूरी ताकत लगा रखी है कि दुनिया के सभी देश ईरान से तेल न खरीदें। ईरान से तेल न खरीदने के कारण विश्व बाजार में ईरान द्वारा सप्लाई किए जाने वाले तेल की मात्रा उपलब्ध नहीं है। विश्व बाजार में तेल की उपलब्धता कम हुई है और तदानुसार तेल के मूल्यों में वृद्धि हो रही है। इस समस्या का हल सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देना है। जैसे मेट्रो अथवा बस से यात्री को गन्तवय स्थान पर ले जाने में प्रति व्यक्ति तेल की खपत कम होती है। निजी कार से जाने में तेल की खपत अधिक होती है। इसलिए यदि हमें रूपये की कीमत को उठाना है तो हमें सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था में सुधार करना होगा जिससे की लोगों के लिए निजी कार का उपयोग करना जरूरी न रह जाए। साथ-साथ हमें मैन्युफैक्चरिंग के स्थान पर सेवा क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। मैन्युफैक्चरिंग में ऊर्जा की खपत ज्यादा होती है, सेवा क्षेत्र में ऊर्जा की जरूरत कम पड़ती है। सेवा क्षेत्र के आधार पर यदि हम आर्थिक विकास हासिल करेंगे तो हमें तेल के आयात कम करने तदानुसार हमारा रुपया नहीं गिरेगा। ध्यान दें कि जब हम तेल का आयत अधिक करते हैं उसके लिए हमें डॉलर में पेमेंट अधिक मात्र में करना होता है। इन अधिक मात्र में डॉलर को अर्जित करने के लिए हमें निर्यात अधिक करने पड़ते हैं। निर्यात अधिक करने के दबाव में हमें अपना माल सस्ता बेचना पड़ता है जिसके कारण हमारा रुपया टूटता है।

बीते साल अक्टूबर में रुपया लुढ़ककर 74 रुपया प्रति डालर के न्यूनतम स्तर पर आ गया था। इसके बाद कुछ समय के लिए सुधार हुआ और वर्तमान में यह पुन: 73 रूपये के पास लुडक गया है। विश्लेषकों का मानना है की आने वाले समय में यह पचहत्तर रूपये प्रति डॉलर या उससे भी कम कीमत पर गिर सकता है। बताते चलें की 75 रूपये प्रति डॉलर का अर्थ हुआ कि रुपया कमजोर है चूंकि एक डॉलर खरीदने के लिए आपको 75 रूपये देने पड़ते हैं यानी रूपये की कीमत कम है। 80 रूपये प्रति डॉलर का अर्थ हुआ कि रुपया इससे भी ज्यादा कमजोर है चूंकि एक डॉलर खरीदने के लिए अब आपको 80 रूपये देने पड़ते हैं। किसी भी मुद्रा का मूल्य अंतत: उस देश की प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति से निर्धारित होता है। जैसे मान लीजिए किसी खिलौने के उत्पादन में भारत में लागत 73 रूपये पड़ती है। उसी खिलौने के उत्पादन में अमेरिका में एक डॉलर का खर्च आता है। ऐसे में एक भारतीय रूपये का मूल्य 73 रूपये प्रति डॉलर हो जाएगा। यदि हम उस खिलौने को तिहत्तर के स्थान पर साठ रूपये में उत्पादित करने लगें तो हमारी मुद्रा का मूल्य भी 73 से बढ़कर 60 रूपये प्रति डॉलर हो जाएगा। जैसे-जैसे देश की कुशलता बढ़ती है अथवा उसकी प्रतिस्पर्धा करने की शक्ति बढ़ती है वैसे-वैसे उसकी मुद्रा ऊपर उठती है। प्रतिस्पर्धा शक्ति को निर्धारित करने में अभी तक बुनियादी संरचना का बहुत योगदान माना जाता था। अपने देश में बिजली, सड़क, टेलीफोन, हवाई अड्डे, इत्यादि की व्यवस्था लचर होने से माल के आवागमन में अथवा सूचना के आदान प्रदान में खर्च ज्यादा आता था जिससे हमारी उत्पादन लागत ज्यादा होती थी।

बीते पांच वर्षों में एनडीए सरकार ने बुनयादी संरचना में विशेष सुधार किए हैं। आज लगभग पूरे देश में बिजली का गुल होना समाप्त प्राय हो गया है, तमाम हाईवे बन गए हैं, हवाई यात्रा सुगम हो गई है, इत्यादि। इसलिए हमारी प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति का निर्धारण अब बुनियादी संरचना के कारण नहीं होता है ऐसा हम मान सकते हैं। प्रतिस्पर्धा शक्ति के निर्धारित होने का दूसरा कारण संस्थाएं है जैसे न्याय की संस्था, पुलिस की संस्था, एवं नौकरशाही की संस्था और इन संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचारण अपने देश में यदि हमको माल सस्ता बनाना है तो ऊद्यामी को त्वरित न्याय, पुलिस से संरक्षण एवं भ्रष्टाचार से मुक्ति देनी होगी। तब ही हमारी प्रतिस्पर्धा शक्ति बढ़ेगी और रूपये का मूल्य स्वयं उठने लगेगा।

यह दीर्घ कालीन परन्तु असली बात है। वर्तमान समय में जो रूपये में गिरावट आ रही है इसका एक प्रमुख कारण तेल के बढ़ते आयात हैं। हमारी ऊर्जा की जरूरतें बढ़ रही हैं और तदानुसार हमें तेल के आयात अधिक करने पड़ रहे हैं। इस समस्या को और गहरा बना दिया है ईरान के विवाद ने अमेरिका ने पूरी ताकत लगा रखी है कि दुनिया के सभी देश ईरान से तेल न खरीदें। ईरान से तेल न खरीदने के कारण विश्व बाजार में ईरान द्वारा सप्लाई किए जाने वाले तेल की मात्रा उपलब्ध नहीं है। विश्व बाजार में तेल की उपलब्धता कम हुई है और तदानुसार तेल के मूल्यों में वृद्धि हो रही है। इस समस्या का हल सार्वजनिक यातायात को बढ़ावा देना है। जैसे मेट्रो अथवा बस से या

निजी कार से जाने में तेल की खपत अधिक होती है। इसलिए यदि हमें रूपये की कीमत को उठाना है तो हमें सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था में सुधार करना होगा जिससे की लोगों के लिए निजी कार का उपयोग करना जरूरी न रह जाए। साथ-साथ हमें मैन्युफैक्चरिंग के स्थान पर सेवा क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए। मैन्युफैक्चरिंग में ऊर्जा की खपत ज्यादा होती है, सेवा क्षेत्र में ऊर्जा की जरूरत कम पड़ती है। सेवा क्षेत्र के आधार पर यदि हम आर्थिक विकास हासिल करेंगे तो हमें तेल के आयात कम करने तदानुसार हमारा रुपया नहीं गिरेगा। ध्यान दें कि जब हम तेल का आयत अधिक करते हैं उसके लिए हमें डॉलर में पेमेंट अधिक मात्र में करना होता है। इन अधिक मात्र में डॉलर को अर्जित करने के लिए हमें निर्यात अधिक करने पड़ते हैं। निर्यात अधिक करने के दबाव में हमें अपना माल सस्ता बेचना पड़ता है जिसके कारण हमारा रुपया टूटता है।

रूपये के गिरने का तीसरा कारण हमारे द्वारा मुक्त व्यापार को अपनाना है। जैसा ऊपर बताया गया है की हमारे न्याय, पुलिस एवं नौकरशाही की संस्थाओं के भ्रष्टाचार के कारण अपने देश में माल के उत्पादन में लागत ज्यादा आती है। ऐसे स्थिति में यदि हम मुक्त व्यापार को अपनाते हैं तो दूसरे देशों से माल का आयत अधिक होता है क्योंकि वहां पर न्याय, पुलिस एवं भ्रष्टाचार की स्थिति हमारी तुलना में उत्तम है। वहां के उद्यमी को माल के उत्पादन में लागत कम आती है और वह अपने माल को हमारे देश में सस्ता बेच सकता है। इस परिस्थिति में हमारे सामने दो रास्ते खुले हैं। या तो हम अपनी न्याय, पुलिस एवं भ्रष्टाचार की व्यवस्थाओं को सुधारें अथवा हम बाहर से आने वाले माल पर आयात कर बढ़ा दें। मान लीजिए किसी खिलोने की चीन में उत्पादन लगत 60 रूपए आती है जबकि भारत में 73 रूपये आती है। ऐसे में हमारा माल चीन से पिटता है। हमारी उत्पादन लगत में यदि 13 रुपया न्याय, पुलिस एवं भ्रष्टाचार का हिस्सा है तो इनके सुधार करने से हमारी उत्पादान लागत 60 रूपये हो जाएगी।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)