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Thursday 17th of October 2019
ओपिनियन

प्लास्टिक के नीचे दबी मानवीय सभ्यता

Friday, September 20, 2019 11:10 AM
सांकेतिक तस्वीर।

आज सम्पूर्ण विश्व में प्लास्टिक का उत्पादन 30 करोड़ टन प्रति वर्ष किया जा रहा है। आंकड़े बताते है कि प्रति वर्ष समुद्र में जाने वाला प्लास्टिक कचरा 80 लाख टन है। अरबों टन प्लास्टिक पृथ्वी के पानी स्रोतों खासकर समुद्रों-नदियों में पड़ा हुआ है। लगभग 15 हजार टन प्लास्टिक हर दिन इस्तेमाल में लाया जाता है। वर्ष 1950 से अब तक वैश्विक स्तर पर 8.3 से 9 अरब मीट्रिक टन प्लास्टिक का उत्पादन हो चुका है। यह कचरा ढेर चार से अधिक माउंट एवरेस्ट के बराबर है। अब तक निर्मित कुल प्लास्टिक का लगभग 44 फीसद वर्ष 2000 के बाद बनाया गया है। वहीं भारत में प्रतिदिन 9 हजार एशियाई हाथियों के वजन जितना 25,940 टन प्लास्टिक कचरा पैदा होता है। एक भारतीय एक वर्ष में औसतन 11 किग्रा प्लास्टिक का इस्तेमाल करता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक 41 लाख टन से 1.27 करोड़ टन के बीच प्लास्टिक हर साल कचरा बनकर समुद्र में प्रवेश करता है। यह वर्ष 2025 तक दोगुना हो जाएगा। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हर साल लगभग 5 ट्रिलियन प्लास्टिक की थैलियां दुनियाभर में उपयोग की जाती हैं। प्लास्टिक को पूरी तरह से खत्म होने में 500 से 1,000 साल तक लगते हैं। 50 प्रतिशत प्लास्टिक की वस्तुएं हम सिर्फ  एक बार काम में लेकर फेंक देते हैं। ये आंकड़े प्लास्टिक के खतरों को चीख-चीखकर बता रहे हैं।

प्लास्टिक कचरे ने आज समुद्रों, नदियों, भूमि, पहाड़ों आदि सभी प्राकृतिक स्थलों के साथ ही सार्वजनिक मानवीय सभ्यता को बेरंग और सड़ांध में बदल दिया है। माइक्रो प्लास्टिक ऐसे कण हैं जो 5 मिमी से भी कम आकार के होते हैं। ये प्राथमिक औद्योगिक उत्पादों जैसे स्क्रबर या प्रसाधन सामग्री के द्वारा वातावरण में प्रवेश करते हैं। ये शहरों में अपशिष्ट जल के माध्यम से वातावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। पॉली प्राजीलीन, पॉली, थिलीन, टेरेप्थलेट आदि प्लास्टिक के ही ऐसे रूप हैं, जो सूक्ष्म कणों के रूप में जल, भोजन एवं वायु के साथ हमारे शरीर में प्रवेश कर नुकसान पहुंचा रहे हैं। अनेक अध्ययनों से पता चला कि ये कण हमारे प्रतिरोधी तंत्र को हानि पहुंचाते हैं। प्लास्टिक के कचरे का दुष्प्रभाव जमीन, पानी, हवा तीनों पर पड़ता है। प्लास्टिक के जमीन में मिलने से जमीन की उर्वरा शक्ति कम होती जा रही है। उसका दुष्प्रभाव इंसानों के साथ ही अन्य जीवों को पड़ रहा है। भारत में हर साल हजारों गायों और अन्य मवेशियों की मौत का कारण भी प्लास्टिक की थैलियां निगलना है। प्लास्टिक की थैलियां पर्यावरण, समुद्र और धरती पर रहने वाले जीवों के लिए बेहद हानिकारक हैं। कैंसर जैसी घातक बीमारी के लिए प्लास्टिक को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। हर व्यक्ति हर हफ्ते पांच ग्राम प्लास्टिक निगल रहा है, जो कई-कई जटिल बीमारियों के पैदा करने का कारण है। पर्यावरण प्रदूषण से लेकर तमाम तरह की घातक बीमारियों का कारण प्लास्टिक ही है।

भारत में प्लास्टिक कचरे की समस्या एक चुनौती बनी हुई है। यहां के बाजारों में उपलब्ध प्लास्टिक की थैलियां सबसे ज्यादा संख्या में प्रदूषण फैला रही हैं। प्लास्टिक के उत्पादन और वितरण पर नियंत्रण रखना प्रथम प्रयास होना चाहिए। सिंगल- यूज प्लास्टिक बैग की जगह ऐसे बैग बनाए जाएं, जो कई बार उपयोग करने लायक हों। ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 को प्रभावशाली ढंग से लागू किया जाए। इसके अंतर्गत कचरे को सूखे और गीले में अलग-अलग करके रखा जाए। इससे पर्यावरण को हो रही क्षति को रोकते हुए रोजगार के अवसर भी बढ़ाए जा सकते हैं। भारत ने प्लास्टिक के विरुद्ध 20 अगस्त को भारतीय संसद में जंग छेड़ी है। 2 अक्टूबर से भारतीय रेलवे सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाने जा रहा है। ये घोषणाएं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के कुछ दिनों बाद आई हैं, जिसमें उन्होंने नागरिकों से प्लास्टिक के उपयोग को छोड़ने का आग्रह किया था। विभिन्न क्षेत्रों में हमें प्लास्टिक प्रदूषण के कारण प्रति वर्ष 13 अरब रुपये का आर्थिक नुकसान भी झेलना पड़ रहा है। प्लास्टिक प्रदूषण फैलाने के मामले में भारत दुनिया के 20 शीर्ष देशों में शामिल है। प्लास्टिक के बहुत ज्यादा इस्तेमाल से पर्यावरण के लिए बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

सब जानते हैं कि प्लास्टिक लोगों की जिंदगी का एक हिस्सा बन गया है। लेकिन उसके नुकसान का किसी को भी अंदाजा नहीं है। इन खतरों के बीच भारत सरकार ने इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक को वर्ष 2022 तक पूरी तरह से खत्म का इरादा किया है। एक बार में इस्तेमाल किए जाने वाले प्लास्टिक का विकल्प भी खोजा जाना जरूरी है। बांस, पौधों, मिट्टी, लकड़ी आदि के बने बर्तन और पत्तियों से बनी प्लेटें, ग्लास, दोने, पत्तल आदि ही बेहतर विकल्प हो सकते हैं। इसके अलावा जूट-कपड़े आदि के थैलों-केरी बैग्स का अधिकाधिक इस्तेमाल करने को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। यह तभी संभव है जब सरकारों के साथ-साथ आम जनता भी इस मुहिम से जुड़ें। वास्तव में सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल देश दुनिया के लिए बहुत बड़ा खतरा बन गया है। प्लास्टिक के उपयोग और उसके सुरक्षित निपटान से जुड़े मुद्दों पर सफलता प्राप्त करना एक लंबे समय की मांग करता है। हमें जल्द से जल्द सरकारी एवं सामुदायिक स्तर पर इसके लिए प्रयास करने होंगे। अगर प्लास्टिक को विदा नहीं किया गया तो पूरी मानवीय सभ्यता प्लास्टिकी पहाड़ नीचे दबकर नष्ट हो जाएगी। हमें प्लास्टिक की विदाई में मन, वचन व कर्म से जुट जाना होगा अन्यथा हम सबकी मौत निश्चित है।                     
रामविलास जांगिड़ (ये लेखक के अपने विचार हैं)