Dainik Navajyoti Logo
Thursday 17th of October 2019
ओपिनियन

कुपोषण की समस्या से जूझता बचपन

Friday, September 27, 2019 10:20 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।

हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कुपोषण को लेकर राज्यों के हालात पर किए अध्ययन में बताया कि देश में हर तीन में से दो बच्चों की मौत कुपोषण से हो रही है। देश में सालाना करीब 14 लाख बच्चों की मौत हो रही है, जिसमें से सात लाख से ज्यादा मौतें कुपोषण से हो रही हैं। इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान की स्थिति ज्यादा गंभीर है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में पांच वर्ष तक की आयु के ज्यादातर बच्चे कुपोषण से ग्रस्त हैं। जबकि बीते कुछ वर्षों से बच्चों में मोटापा भी देखने को मिल रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में 39 फीसदी बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास कम है। इनमें से सबसे ज्यादा 49 फीसदी उत्तर प्रदेश से हैं। वहीं कम वजन की बात करें तो देश में 33 फीसदी बच्चे कम वजन से पीड़ित हैं। इसे लेकर सबसे खराब हालात झारखंड में देखने को मिल रहे हैं जहां 42 फीसदी बच्चे कम वजन के मिल रहे हैं।

देश में एनीमिया के शिकार बच्चे करीब 60 फीसदी हैं। वहीं 54 प्रतिशत महिलाएं इसकी शिकार हैं। दिल्ली की महिलाओं में सबसे ज्यादा एनीमिया की समस्या पाई जाती है। हालांकि देश में कुपोषण की स्थिति में सुधार हुआ है लेकिन अभी भी 5 साल से कम उम्र के बच्चों की कुपोषण से मौत हो रही है। स्थिति यह है कि करीब 50 फीसदी से ज्यादा मौत के पीछे कुपोषण ही वजह है। लगभग सभी राज्यों में कुपोषण एक बड़ी समस्या बनी हुई है। बाकी राज्यों के मुकाबले मध्य प्रदेश में मोटापा बढ़ने की दर सबसे ज्यादा है। नीति आयोग के सदस्य डॉ. वीके पॉल ने बताया कि देश में एक और समस्या सामने आ रही है जिसमें बच्चे प्री डायबिटिक मिल रहे हैं। 10 से 19 वर्ष की आयु के बीच करीब नौ फीसदी बच्चे प्री डायबिटिक हैं। कई चिकित्सीय शोध में इसका खुलासा भी हो चुका है।ताजा रिपोर्ट के अनुसार 2017 में पांच वर्ष तक की आयु के 14 लाख बच्चों की मौत हुई, इसमें से 7 लाख 6 हजार की मौत कुपोषण से हुई। 1990 में भारत में कुपोषण की वजह से होने वाली मौत की दर प्रति एक लाख पर 2336 थी जो कि वर्ष 2017 में घटकर 801 पर पहुंच गई है। कुपोषित 54.9 फीसदी नवजात गंभीर रोगों की चपेट में आ रहे हैं। कम वजन वाले करीब 84.7 फीसदी बच्चे संक्रमण, श्वास रोग इत्यादि की चपेट में आ रहे। कम वजन वाले बच्चों में करीब 47 फीसदी का मानसिक व शारीरिक विकास मंद गति से हो रहा है। ये श्वास रोगों से जुड़े संक्रमण के शिकार हो रहे हैं। कुपोषण को लेकर राज्यों के स्तर पर पहली बार आईसीएमआर ने इस तरह का अध्ययन किया है। वर्ष 1990 से लेकर 2017 तक के हालातों पर किए इस अध्ययन को द लासेंट में प्रकाशित किया है। इसके अनुसार, उत्तर प्रदेश में प्रति एक लाख में से 60 हजार बच्चों का जीवन गंभीर चुनौतियों से घिरा हुआ है। वैज्ञानिकों ने इस गंभीर श्रेणी में राजस्थान, बिहार और असम को भी रखा है।

भारत की जनसंख्या अधिक होने के कारण यहां कुपोषण का स्तर व्यापक है। दरअसल कुपोषण का इकलौता कारण भोज्य पदार्थों की पर्याप्त पहुंच ना हो पाना ही नहीं है बल्कि सही मायनों में आहार में पोषक तत्वों की कमी होना है। क्योंकि ये पोषक तत्व ही हमारे शरीर में ऊर्जा प्रदान करने का माध्यम है। जब आहार में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, विटामिन और खनिज जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलते तब व्यक्ति अल्पपोषण से पीड़ित हो जाता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति की उम्र के हिसाब से ऊंचाई और वजन कम होने लगता हैै। और जब इन पोषक तत्वों की शरीर में अधिकता हो जाती है तो अतिपोषण के रूप में व्यक्ति को मोटापा घेरने लगता है, उसे हृदय रोग, मधुमेह व कैंसर की बीमारियां का शिकार होना पड़ता है। भारत के बच्चों में सर्वाधिक कुपोषण का कारण लड़कियों की कम उम्र में शादी होना है। देश में आज भी बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 व कानून मौजूद होने के बावजूद 47 फीसदी लड़कियों की शादी 18 वर्ष की उम्र से पहले हो जाती है। इस कारण नाबालिग लड़कियों की कोख से जन्म लेने वाले अधिकतर बच्चे अविकसित व कुपोषण का शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा हमारे देश में लड़कियों से होने वाले भेदभाव के चलते उनकी सेहत पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता जितना की लड़के की सेहत पर दिया जाता है।

एक कहावत के अनुसार मां लड़के की खिचड़ी में घी ज्यादा ही डालती है। इस वजह से लड़कियों को पर्याप्त मात्रा में वे सभी पोषक तत्व मिल नहीं पाते जो उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि कर सकें। देश में कम वजन वाले कुपोषित बच्चों की संख्या अधिक वजन यानी मोटापा से ग्रस्त बच्चों की संख्या से कई गुणा अधिक है। भारत में आज भी 27 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने को विवश है। जाहिर है कि इस स्थिति में इन लोगों को पर्याप्त मात्रा में कैलोरी युक्त भोजन की प्राप्ति नहीं हो पाती है। वहीं जन्म के समय शिशु के लिए मां का दूध उत्तम व अनिवार्य आहार होने के बाद भी देश में केवल 37.1 प्रतिशत नवजात शिशु ही मां का स्तनपान करते हैं। नवजात के लिए पौष्टिक व प्रतिरक्षा मूल्य के लिए आवश्यक मां का दूध उन्हें नहीं मिलने से वे कुपोषित हो जाते हैं। इस तरह ज्ञान की कमी के कारण बच्चों का लालन-पालन बेहतर तरीके से नहीं हो पाता है। दूसरी ओर लाखों बच्चे मोटापा से ग्रस्ति हैं। ये वे बच्चे हैं जिन्हें पोषक तत्व तो अधिक मात्रा में मिल रहे हैं लेकिन वे उन्हें पचाने के लिए व्यायाम और योग पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। इससे इतर उनको मोबाइल गेम्स और टेलीविजन ने इस कदर आकर्षित कर रखा है कि उनकी मैदानी खेलों के प्रति रुचि ही खत्म होने लगी है। देश की आबादी का बड़ा हिस्सा गंदा एवं जहरीला पानी पीने को मजबूर है। भारत की 67 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और 7 प्रतिशत ग्रामीण आबादी तक स्वच्छ पानी की पहुंच नहीं है।           
देवेन्द्रराज सुथार (ये लेखक के अपने विचार हैं)