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Thursday 17th of October 2019
ओपिनियन

फारूक की गिरफ्तारी के मायने

Monday, September 30, 2019 10:50 AM
फारूक अब्दुल्ला (फाइल फोटो)

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और लोकसभा सांसद फारूक अब्दुल्ला को जन सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तार किया गया है। ऐसे वक्त में जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद लगाई गई पाबंदियों से जुड़े सवालों पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रही थी, नेशनल कानफ्रेंस के सुप्रीमो फारूक अब्दुल्ला को हिरासत में लिए जाने की खबर आई। पांच अगस्त को जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद से ही उन्हें अपने घर में ही नजरबंद किया गया था। अब उन्हें पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत हिरासत में रखा गया है। मानवाधिकार संगठन इसे कानून का दुरुपयोग बता रहे हैं। राज्यों में जो रासुका (एनएसए) है, कश्मीर में उसी तर्ज पर पीएसए है। फारूक अब्दुल्ला को गृह मंत्रालय ने उनके आवास पर ही हिरासत में ले रखा है और उनके आवास को सब्सिडरी जेल घोषित किया गया है। वह अपने ही घर में रहने को मजबूर हैं, लेकिन इस दौरान वह अपने मित्र या किसी अन्य रिश्तेदार से नहीं मिल सकते हैं।

फारूक के वालिद शेख अब्दुल्ला ने 1978 में यह कानून बनाया था। उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन यही कानून उनके बेटे पर लागू किया जाएगा। शेख ने यह कड़ा कानून लकड़ी के तस्करों के खिलाफ  बनाया था। जन सुरक्षा कानून (पीएसए) के तहत दो प्रावधान हैं-लोक व्यवस्था और राज्य की सुरक्षा को खतरा। पहले प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के छह महीने तक और दूसरे प्रावधान के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है। दरअसल, फारूक अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला के कार्यकाल में बने इस कानून का मकसद भले ही कानून व्यवस्था बनाए रखना था मगर इसका राजनीतिक उद्देश्यों के लिए जमकर दुरुपयोग हुआ है। शेख अब्दुल्ला ने अपने विरोधियों के खिलाफ  भी इस कानून का इस्तेमाल किया। बहरहाल इस कानून के घेरे में आने वाले फारूक पहले पूर्व मुख्यमंत्री हैं। पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती भी पांच अगस्त से हिरासत में है, लेकिन यह कानून चस्पा नहीं है। 1990 में कश्मीर में आतंकवाद भड़कने और फैलने के बाद आतंकियों, अलगाववादियों और पत्थरबाजों पर भी पीएसए लगाया गया, लेकिन आज फारूक अब्दुल्ला को ही आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है।

दरअसल, पीसीए के तहत हिरासत में लिए गए व्यक्ति को यह बताना जरूरी नहीं होता कि उसे क्यों गिरफ्तार किया गया है। इसके अंतर्गत कानून व्यवस्था के मसले पर एक साल और सुरक्षा की चुनौती के चलते दो साल तक गिरफ्तार किया जा सकता है। हालांकि व्यक्ति को पांच दिन और विशेष परिस्थिति में दस दिन के बाद बताया जाना जरूरी होता है कि उसे क्यों गिरफ्तार किया गया। कारण बताए जाने के बाद फारूक अब्दुल्ला इसके खिलाफ  हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर सकते हैं। वैसे यह विडंबना ही है कि नेशनल कॉनफ्रेंस के सुप्रीमो, श्रीनगर से लोकसभा सदस्य, पूर्व राज्यसभा सदस्य व पूर्व मंत्री फारूक अब्दुल्ला के खिलाफ उस कानून का इस्तेमाल किया गया जो आतंकवादियों के खिलाफ प्रयुक्त किया जाता रहा है। वह भी तब जब वे पांच अगस्त की कार्रवाई के बाद से ही घर में नजरबंद हैं। हालांकि, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से दो दिन पहले वे नेशनल कॉनफ्रेंस के प्रतिनिधिमंडल व पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के साथ नरेंद्र मोदी से उनके निवास पर मिले थे।

फारूख की गिरफ्तारी के अलावा पिछले दिनों जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत एवं सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कश्मीर के हालात के प्रति सरोकार जताए। उन्होंने यहां तक कहा है कि यदि जरूरत पड़ी, तो वह श्रीनगर भी जा सकते हैं। जस्टिस गोगोई ने इसे गंभीर मामला माना है कि आम आदमी इंसाफ  के लिए हाईकोर्ट में नहीं जा पा रहा है, लिहाजा हालात का जायजा वह खुद लेना चाहते हैं। वैसे हालात के मद्देनजर उन्होंने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से रपट तलब की है। बेशक कश्मीर पर सर्वोच्च अदालत ने कोई फैसला नहीं सुनाया है।

अलबत्ता प्रधान न्यायाधीश ने ऐसे निर्देश जरूर दिए हैं कि राष्ट्रहित और आंतरिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सामान्य जीवन यथाशीघ्र सुनिश्चित किया जाए। अदालत ने केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन से 15 दिनों के अंतराल में हलफनामा के जरिए जवाब भी मांगा है, लेकिन अनुच्छेद 370 पर कोई निर्णय नहीं किया गया है। सर्वोच्च न्यायालय 30 सितंबर को अगली सुनवाई करेगा, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री डा. फारूक अब्दुल्ला का मामला भी लिया जा सकता है। खाद्यान्न, गैस सिलेंडर, पेट्रोल-डीजल आदि का तीन महीने का स्टाक है। फोन लाइनें ज्यादातर इलाकों में बहाल कर दी गई है और मोबाइल-इंटरनेट सेवाएं भी धीरे-धीरे सामान्य की जा रही हैं। यह कश्मीर के अंदरूनी हालात का सरकारी पक्ष है। यदि अब प्रधान न्यायाधीश श्रीनगर जाते हैं, तो असलियत बिल्कुल खुलकर सामने आ जाएगी, लेकिन यह भी यथार्थ है कि कर्फ्यू, संचार सेवाओं का ठप होना कोई नई बात नहीं है। 2016 में जब बुरहान वानी आतंकी सरगना मारा गया था, तो करीब तीन माह तक कश्मीर बंद रहा था। तब कश्मीर का बेचौन तबका इतना चिलचिलाया नहीं था। बेशक 370 हटाने के बाद हालात संवेदनशील हैं, लिहाजा कानून-व्यवस्था बनाए रखना भी सरकार का दायित्व है।
तारकेश्वर मिश्र (ये लेखक के अपने विचार हैं)