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Thursday 20th of June 2019
इंडिया गेट

संकट चौतरफा है...

Thursday, May 30, 2019 09:55 AM
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी (फाइल फोटो)

- शिवेश गर्ग
राजद सुप्रीमो लालू यादव जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को अध्यक्ष पद न छोड़ने की नसीहत दे रहे थे, तो मुमकिन था कि उन्हें खुद अपने बेटे तेजस्वी यादव की चिंता होगी। क्योंकि बिहार में राजद को मिली हार भी ऐतिहासिक ही है। पहले जनता दल और बाद में राजद बनने तक के सफर से लेकर आज तक कभी एक क्षेत्रीय क्षत्रप के तौर पर लालू यादव की पार्टी की ऐसी दुर्गति नहीं हुई थी। ऐसा कभी नहीं हुआ जब पार्टी को लोकसभा में एक सीट भी हासिल न सकी हो। पिछले आम चुनाव में भी राजद की हालत कुछ अच्छी नहीं थी। पर इस बार उसे काफी उम्मीदें थी, क्योंकि नीतीश कुमार के भाजपा के साथ चले जाने से उनका पुराना एमवाई समीकरण पुख्ता होने के आसार दिख रहे थे।

पर नतीजों ने सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। यह पहला चुनाव था, जिसमें लालू प्रसाद यादव सीन से गायब थे। उनकी कमी राजद को बेहद महंगी पड़ी। गठबंधन सहयोगियों को चुनने, असंतुष्टों को मनाने, सहयोगियों के साथ सीट बंटवारे पर समझौता करने से लेकर पार्टी और परिवार के भीतर एका बनाए रखने की अनेक जिम्मेदारियां तेजस्वी यादव पर थीं। बेशक, उनके साथ उनकी मां राबड़ी देवी और बहन मीसा भारती खड़ी थीं, लेकिन बड़े भाई तेजप्रताप यादव की कभी रूठने, कभी मान जाने जैसी नासमझियों से राजद को काफी नुकसान हुआ।

बहरहाल, यह सूरते हाल केवल बिहार में राजद की ही हो ऐसा नहीं है। दक्षिण भारत को छोड़ दें तो उत्तर भारत में तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों की सियासत को नरेन्द्र मोदी की आंधी से काफी झटका लगा है। हालांकि दक्षिण में भी कर्नाटक अपवाद रहा है। चुनाव से पहले ऐसा लगने लगा था कि भाजपा के खिलाफ एक मजबूत गठबंधन बन सकता है। आलम तो यहां तक था कि प्रधानमंत्री पद के लिए भी दबी जुबान में मंसूबे जाहिर किए जाने लगे थे। पर चुनाव के नतीजों ने इन हसरतों को सतह पर नहीं आने दिया। आज आलम है कि तमाम क्षेत्रीय दलों में भी हार के कारण तलाशे जा रहे हैं। राजद, सपा, बसपा, जेडीएस, आम आदमी पार्टी तृणमूल कांग्रेस तक के नेता परेशान हैं।

बाकी दलों की तुलना में तृणमूल की हालत थोड़ी बेहतर जरूर है, पर फिलहाल बाकी दलों की तुलना में उसके खतरे भी अधिक है। अभी जहां ममता थोड़ी सांस लेकर तेजी से घटते जनाधार को कैसी बचाया जाए, इस सवाल पर विचार करती, भाजपा लगातार उनकी पार्टी में सेंध लगाने में जुट गई है। दीदी के कभी दाहिना हाथ रहे मुकुल राय और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय तृममूल के असंतुष्टों की तलाश में जुटे हैं। बतर्ज घर का भेदी लंका ढाहे, मुकुल राय तेजी से ममता के लिए चुनौती बन कर उभर रहे हैं। क्योंकि अभी चंद साल पहले तक भाजपा में शामिल होने से पहले तृणमूल का संगठन वे ही संभालते रहे हैं।

नतीजे आने के बाद से लेकर अभी तक तृणमूल के तीन विधायक और पचास से अधिक पार्षद भाजपा में शामिल करवाए जा चुके हैं। दीदी ने भी मामले की नजाकत और बढ़ती चुनौती के मद्देनजर गुरुवार को प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने से इनकार कर दिया है। बात अगर अपन मुल्क के सबसे बड़े सूबे यानी यूपी की करें तो क्षेत्रीय क्षत्रपों की हालत कम नाजुक नजर नहीं आती। चुनाव से पहले सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव बसपा को पर्याप्त तवज्जो दे रहे थे, जिसे लेकर न केवल पार्टी के लोगों अलबत्ता खुद उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी नाखुश थे। खबर तो यहां तक थी कि अखिलेश ने मायावती के कहने पर अपनी पार्टी के कई जीतने वाले नेताओं का टिकट काटा।

पर भाजपा को हराने के मकसद से सपा तमाम कार्यकर्ताओं ने अखिलेश के फैसले को मंजूर कर लिया। साथ में रैलियां हुईं, सभाएं हुईं, पोस्टरों में मायावती, मुलायम दोनों साथ नजर आए। इसे सूबे की सियासत का एक नया अध्याय माना माना गया था। पर अध्याय के आगे के पन्ने खुलते इससे पहले ही चुनाव के पार्टी बनाई और इन चुनावों में गठबंधन के मुकाबले अपने प्रत्याशी खड़े किए। इसका खामियाजा भी सपा को ही भुगतना पड़ा नतीजों ने कहानी ही खत्म कर दी। लेकिन जो नतीजे आए हैं, उसमें हार के बावजूद मायावती का पलड़ा भारी दिख रहा है।

क्योंकि पिछली लोकसभा में बसपा शून्य पर थी, इस बार दहाई अंक यानी दस पर पहुंच गई है। जबकि सपा को पांच सीटें हासिल हुई हैं। पिछली बार भी सपा को पांच सीटें ही हासिल हुई थी। सियासत का नया पहलू यह है कि अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव को हार का सामना करना पड़ा है। लिहाजा, नतीजों के बाद अब समाजवादी पार्टी में नाराजगी के सुर उठ रहे हैं और अखिलेश यादव की नेतृत्व क्षमता पर सवाल भी। उनने पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया, जो सफल नहीं रहा। उसके बाद अपने नाराज चाचा शिवपाल यादव को वे नहीं मना पाए। कुल मिलाकर उनके नेतृत्व में समाजवादी पार्टी पिछड़ती गई है। तो फिलहाल संकट केवल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का ही नहीं है। क्षेत्रीय क्षत्रप की गहरे संकट के जद में हैं।