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Thursday 20th of June 2019
इंडिया गेट

शपथग्रहण का संदेश

Friday, May 31, 2019 09:55 AM
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शपथ लेते हुए।

- शिवेश गर्ग
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब गुरुवार को शपथ ले रहे थे, तो 2014 की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास से भरे और मजबूत दिख रहे थे। मुमकिन है इस मजबूती के पीछे उन्हें चुनाव में मिला पहले से कहीं अधिक जोरदार बहुमत हो या फिर पांच साल तक प्रधानमंत्री के पद पर रह चुकने से पैदा हुआ आत्मविश्वास था। यह आत्मविश्वास न केवल उनके हाव भाव में दिख रहा था, बल्कि उनके साथ बैठी उस टोली को भी देखकर उनके खुद पर भरोसे का अहसास किया जा सकता था। कैबिनेट की शपथ लेने वालों में वे चेहरे गायब थे, जिनने पांच साल सरकार को चलाने में अहम भूमिका अदा की थी। उन चेहरों में जो सबसे अहम नाम लिया जा सकता है वह नाम अरुण जेटली का है।

पिछली सरकार में अरुण जेटली वित्तमंत्री रहे थे और ऐसे कई नाजुक मौके आए जब उन्होंने मोदी सरकार के लिए संकटमोचक का काम किया था। कैबिनेट की बैठकों में भी उनकी सक्रियता चर्चा का विषय बनती रही थी। पिछले कई महीनों से उनकी तबीयत खराब रही है। पिछले साल कुछ महीनों तक उन्हें इलाज के लिए अमेरिका जाना पड़ा था, इस बीच पीयूष गोयल ने वित्तमंत्री की जिम्मेदारी संभाली थी। अबके शपथ से पहले ही उनने अपनी तबीयत का हवाला देते हुए मोदी मंत्रिमंडल में शामिल न होने की बात कही थी। अभी दो दिन पहले इस आशय की एक चिट्ठी उनने प्रधानमंत्री को लिखी थी। हालांकि यह चर्चा भी जोरों पर रही कि उन्होंने नाराजगी में यह चिट्ठी लिखी है।

क्योंकि जब प्रधानमंत्री बुधवार को निजी तौर पर उनसे मिलने जेटली के घर गए थे, तो खबरिया चैनलों पर यह खबर फैली की वे उन्हें मनाने जा रहे हैं, पर बाद में बताया गया कि वे उनकी तबीयत का जायजा लेने गए थे। बहरहाल, वजह जो भी हो, पर अरुण जेटली के तौर पर एक अहम और अनुभवी चेहरा मोदी कैबिनेट से नदारद होगा। जो दूसरा महत्वपूर्ण चेहरा मोदी कैबिनेट में नहीं होगा, वह सुषमा स्वराज का है।

गुरुवार सबेरे तक यह चर्चा जोरों पर थी कि भले ही सुषमा स्वराज धूल से एलर्जी की वजह से विदिशी से चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया हो, पर दोबारा मोदी मंत्रिमंडल में उन्हें अहम पोर्टफोलियो जरूर मिलेगा। पर इस चर्चा को तब विराम लग गया जब शपथग्रहण से पहले प्रधानमंत्री की ओर से बुलायी गयी चाय पार्टी में वे नहीं पहुंचीं। उनके संभावित विकल्प के तौर पर जो चेहरा नजर आया, वह एस.जयशंकर का था। वे सुषमा स्वराज के मातहत विदेश सचिव के तौर पर काम कर चुके हैं। उन्हें कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ दिलायी गयी है।

वे समारोह में पहली कतार में बैठे नजर आए। माना जा रहा है कि उन्हें सुषमा स्वराज की जगह विदेश मंत्रालय सौंपा जा सकता है। बहरहाल, सुषमा स्वराज के समर्थक हैरान रह गए। यह खबर चल पड़ी कि वे नाराज हैं और मुमकिन है शपथग्रहण समारोह में भी हिस्सा न लें। हालांकि वे शपथग्रहण में पहुंची थी और दर्शकदीर्घा में बैठी नजर आयीं। वैसे, शपथग्रहण से पहले एक तीसरे अहम चेहरे के भी नदारद होने की खबरें जोरों पर थीं और वह नाम था राजनाथ सिंह का। बुधवार तक राजनाथ सिंह के करीबियों में बेचैनी महसूस की गई थी।

खबरें आ रही थी कि नरेंद्र मोदी जब शपथ लेंगे तो हो सकता है स्पीकर बनाने की भी अटकलें चल रही थी। क्योंकि उनका गृहमंत्री का पद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को दिया जा सकता है। पर यह सारी अटकलें तब खत्म हो गई, जब शपथग्रहण से पहले कुर्सियां सजीं तो प्रधानमंत्री की कुर्सी की बगल में राजनाथ सिंह बैठे नजर आये। तीसरी कुर्सी अमित शाह की थी। यानी नए मोदी कैबिनेट में प्रधानमंत्री के बाद राजनाथ सिंह की हैसियत होगी।

मुमकिन है उनकी यह हैसियत अगले पांच साल बरकरार रहे, पर गुरुवार को हुए शपथग्रहण समारोह का एक संदेश बेहद साफ है कि नरेंद्र मोदी के बाद भाजपा में प्रधानमंत्री की कुर्सी का दावेदार कौन होगा?  शपथग्रहण में मौजूद भाजपा के कार्यकर्ताओं ने जिन दो नेताओं के शपथ से समय सबसे अधिक नारेबाजी की, उसमें बेशक पहला नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का था, और दूसरा नाम अमित शाह का था। राजनाथ सिंह जब शपथ ले रहे थे तो भाजपा के कार्यकर्ताओं में कोई उत्साह नजर नहीं आया।

सो, कहने की दरकार नहीं कि अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा हर कदम पर यह दिखाना चाहती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह ही पार्टी के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। इससे पहले भी कई मौकों पर यह संदेश दिया जाने लगा है। जब 23 मई को नतीजों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा कार्यालय पहुंचे तो राजनाथ सिंह समेत बाकी नेता मंच पर पहले से बैठे थे और अमित शाह की एंट्री प्रधानमंत्री के साथ हुई। जब अमित शाह दफ्तर पहुंचे तो उन पर नरेन्द्र मोदी की तरह ही फूलों की वर्षा भी की गई।

उन्होंने प्रधानमंत्री की मौजूदगी में उनकी तरह ही लंबा भाषण भी दिया था। जबकि राजनाथ सिंह सहित बाकी नेताओं को बोलने का मौका नहीं दिया गया। जब जीत के बाद प्रधानमंत्री अपने संसदीय क्षेत्र वराणसी पहुंचे तब भी अमित शाह साथ थे और मोदी से पहले अमित शाह को ही बोलने का मौका मिला। बाबा विश्वनाथ की पूजा के समय में नरेन्द्र मोदी के पीछे वे बैठे नजर आये थे। शपथग्रहण समारोह का यह संदेश साफ है कि बेशक अमित शाह को गृहमंत्री न बनाया जाए, पर आने वाले दिनों में नरेन्द्र मोदी के बाद कौन है यह अब रहस्य नहीं रहा।