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Sunday 15th of September 2019
इंडिया गेट

हकीकत को नकारता एक अभिभाषण

Friday, June 21, 2019 08:50 AM
रामनाथ कोविंद (फाइल फोटो)

यह मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का पहला सत्र है लिहाजा राष्ट्रपति का अभिभाषण बेहद अहम होना था। और राष्टÑपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को संसद के दोनों सदनों को संबोधित करते हुए इसे अहम बनाने की कोशिश की भी। उनने अपने अभिभाषण में नरेंद्र मोदी सरकार के अगले पांच साल के कामकाज का जिक्र किया। मसलन, उनने कहा कि आतंकवाद के मुद्दे पर दुनिया भारत के साथ है। मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करवाना बड़ी कामयाबी है। सीमा पार आतंकवादी ठिकानों पर सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक करके भारत ने अपने इरादों और क्षमताओं को प्रदर्शित किया है। भारत को विश्व में एक विशेष पहचान मिली है। उनने बताया कि उनकी सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए तमाम कदम उठा रही है। उनने सिंचाई परियोजनाओं को पूरा करने और फसल बीमा योजना का जिक्र किया। उनने जो सबसे अहम बात कही वह यह कि उनकी सरकार की कोशिश है कि भारत साल 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की इकॉनोमी बने। फिलहाल भारत की इकॉनोमी तकरीबन तीन ट्रिलियन के आसपास की है। यानी पांच साल में अर्थव्यवस्था में तकरीबन 70 गुना की बढ़ोतरी होगी। सुनने में यह बात कानों को अच्छी लगती है, पर मुल्क की अर्थव्यवस्था की मौजूदा हालत के मद्देनजर इस दावे पर भरोसा कर पाना मुमकिन भी नहीं लग रहा। मुल्क की अर्थव्यवस्था फिलहाल जिस रफ्तार से बढ़ रही है, वह एक विवाद का विषय है। अभी पिछले दिनों की मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके अरविंद सुब्रमण्यन ने अपना एक शोध पत्र जारी कर एक अलग किस्म का विवाद खड़ा कर दिया था। उनने कहा था कि भारतीय अर्थव्यवस्था की सकल घरेलू विकास की दर फिलहाल केवल साढ़े चार फीसद ही है।

भारत सरकार साढ़े सात फीसद का जो आंकड़ा दे रही है वह मजह आंकड़ों का हेरफेर है। सुब्रमण्यन के शोध पत्र को खारिज करने वाला जो बयान सरकार की ओर से आया वह नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार का था। राजीव कुमार तमाम कवायद के बाद भी सुब्रमण्यन के शोध के दावे को तो खारिज न कर सके, पर आंकड़ों में हेरफेर की उनकी बात पर जवाब उनने उसी शैली में दिया, जिसमें पिछली सरकार के तमाम मंत्री देते रहे हैं। यानी मुल्क की तमाम समस्याओं के लिए पिछली मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार जिम्मेदार रही है। उनने सरपट कह डाला की आंकड़ों के साथ हेरफेर का यह खेल कांग्रेस सरकार ने ही शुरू किया था। अव्वल उनकी सरकार ने तो केवल उस खेल को जारी रखा है। यह हकीकत भी है कि आंकड़ों में हेरफेर का यह खेल 2011 में शुरू हुआ था, तब मुल्क में यूपीए सरकार थी। पर इस तरह की दलील असल में खुद के लिए संकट पैदा करने वाली है। बेशक, आंकड़ों का यह हेरफेर 2011 में शुरू हुआ, पर सुब्रमण्यन का शोध 2011 के पहले और बाद के सालों में भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी विकास दर को लेकर था। पर सवाल यह है कि यूपीए सरकार के कार्यकाल में आकड़ों के हेरफेर के बाद भी विकास दर पर विवाद नहीं हुआ। क्योंकि 2011 से ठीक पहले यानी वित्तवर्ष 2009-10 में भारत की अर्थव्यवस्था तकरीबन 10 फीसद के आसपास थी। जो बाद के सालों में लगातार घटती ही चली गई। अगर यह मान लिया जाए कि यूपीए सरकार ने आंकड़ों के साथ हेरफेर किया भी, तो उसका वह सियासी लाभ न ले सकी। जब 2014 में मोदी सरकार पहली बार सत्ता में आई तो पहले दो साल विकास का दर साढ़े सात से ऊपर का रहा। पर नोटबंदी और जीएसटी के बाद इस दर में लगातार गिरावट दर्ज की गई। और उसके बाद ही विकास दर को लेकर विवाद और सियासत भी शुरू हुई। बहरहाल, मुद्दा यह है कि अरविंद सुब्रमण्यन के साढ़े चार फीसद की विकास दर की बात को नकार कर अगर मोदी सरकार के तकरीबन सात फीसद की विकास दर सही भी मान लिया जाए, तो भी यह कहीं से मुमकिन नहीं दिखता कि 2024 तक भारत की अर्थव्यवस्था पांच ट्रिलियन तक हो जाने वाली है।

मुल्क की जमीनी हकीकत तो वाकई इसकी गवाही देते नहीं देखते। अब जिस मुल्क में चमकी बुखार और लू जैसे शै देखते-देखते सैकड़ों लोगों की जान लील ले रही है, उस मुल्क की अर्थव्यवस्था को अगर पांच ट्रिलियन कर लेने का सियासी गफलत पाल भी लिया जाए, तो भला आम लोगों की सेहत पर क्या असर पड़ने वाला है। क्या यह संयोग भर है कि जहां मुल्क एक ओर चमकी बुखार से तड़प-तड़प कर मरते बच्चों को देख रहा है वहीं दूसरी ओर मुल्क की अर्थव्यवस्था के पांच ट्रिलियन हो जाने का एक नया सपना भी दिखाया जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया के पास साल 2017 तक कुल 10.41 लाख डॉक्टरों का पंजीकरण हुआ था। इनमें सरकारी अस्पतालों में केवल एक लाख 20 हजार डॉक्टर ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं कि बाकी निजी अस्पतालों में प्रैक्टिस कर रहे हैं। फिर यह सवाल तो उठता है कि दवा, सुविधाएं और डॉक्टरों की कमी से जूझते भारत का सरकारी स्वास्थ्य तंत्र बच्चों को मौत के मुंह में जाने से भला कैसे रोक सकता है। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत जैसी योजना तो न ही इन बच्चों को आयुष्मान बना सकी और न ही योजना का लाभ ही दे सकी। आखि

र राष्ट्रपति अपने अभिभाषण में यह बात कैसे भूल गए?

- शिवेश गर्ग
(ये लेखक के अपने विचार हैं)